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झारखण्ड सरकार ने कहा – तोलोंग सिकि कुंड़ुख़ भाषा की लिपि

ज्ञात हो कि तोलोङ सिकि अथवा तोलोंग लिपि को कुँड़ुख (उराँव) समाज ने कुँड़ुख़ भाषा की लिपि के रूप में स्वीकार किया है। इस लिपि को झारखण्ड सरकार, कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग के पत्रांक 129 दिनांक 18.09.2003 के द्वारा कुँड़ुख (उराँव) भाषा की लिपि के रूप में उद्धृत किया है। इस सरकारी विभागीय
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धुमकुड़िया (एक मुक्त सामाजिक विद्यालय) Dhumkuriya (An Open Social School)

धुमकुड़िया: (एक पारम्परिक सामाजिक पाठशाला) : Dhumkuriya (A Traditional Social School) : परिचय :- धुमकुड़िया, उराँव आदिवासी समाज की एक पारम्परिक सामाजिक पाठशाला है। प्राचीन काल से ही यह, गाँव में एक शिक्षण-शाला के रूप में हुआ करता था, जो गाँव के लोगों द्वारा ही चलाया जाता था। समय के साथ यह पारम्परिक ग्रामीण पाठशाला विलुप्त होने की
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तोलोंग सिकि का कम्प्यूटर फॉन्ट 2002 में लोकार्पित

ज्ञातब्य हो कि तोलोंग सिकि लिपि के विकास में झारखण्ड अलग प्रांत आन्दोलन एवं आंदोलनकारियों की महती भूमिका रही है। ऐसे में 15 नवम्बर 2000 को झारखण्ड राज्य के गठन बाद सामाजिक चिंतकों के बीच आदिवासी भाषाओं के लिए नई लिपि का कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर विकसित करने की ओर ध्यान गया। इस क्रम में कई लोग
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कुँड़ुख़ तोलोंग सिकि के विकास का आरंभिक इतिहास

कुँड़ुख़ तोलोंग सिकि के विकास का आरंभ वर्ष 1989 में हुआ। यह संदर्भ दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल‚ लहेरियासराय (बिहार) में एमबीबीएस कर रहे एक उराँव आदिवासी युवक श्री नारायण उराँव के जीवन संर्घष की कथा से जुड़ा हुआ है। वे वर्तमान में झारखण्ड चिकित्सा सेवा में चिकित्सा पदाधिकारी हैं। वे अपने कॉलेज के दिनों को याद
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‘तोलोंग सिकि वर्णमाला’ का संशोधित स्वरूप जून 1997 को

‘ग्राफिक्स ऑफ तोलोंग सिकि’ नामक पुस्तिका के लोकार्पण के अवसर पर दिनांक 05 मई 1997 को राँची विश्वविद्यालय, राँची के पूर्व कुलपति तथा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विभगाध्यिक्ष भाषाविद डॉ. रामदयाल मुण्डा ने कहा कि – ‘ग्राफिक्स ऑफ तोलोंग सिकि’ पुस्तिका में प्रस्तुत वर्णमाला संस्कृत-हिन्दी की तरह है। आदिवासी भाषा की लिपि के
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कुँड़ुख़ तोलोंग सिकि के विकास की परिकल्पना 1989 में दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल‚ लहेरियासराय (बिहार) से हुआ

ज्ञातव्य है कि डॉ० नारायण उराँव का आवश्यक इंटरर्नशीप अवधि दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, लहेरियासराय (बिहार) में एम.बी.बी.एस. की परीक्षा पास करने के बाद फरवरी 1989 से फरवरी 1990 तक था। उस इंटर्नशीप अवधि में उन्होंने अपने चिकित्सीय कार्य के अतिरिक्त आदिवासी समाज के कई सामयिक प्रष्नों के प्रत्युत्तर में एक पुस्तक लिखी‚ जिसका
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सर्वप्रथम 07 अक्टूबर 1993 को हिन्दी दैनिक ‘आज’ में तोलोङ सिकि के संबंध में विस्तृत लेख छपा

ज्ञातब्य है कि झारखण्ड अलग प्रांत आन्दोलन के छात्र नेताओं एवं बुदि्धजीवियों की राय थी कि आदिवासी भाषाओं की पहचान के लिए एक नई लिपि का विकास हो, पर यह कैसे हो या कौन करे, इस विषय पर सभी मौन रहे। इसी बीच पेशे से चिकित्सीक डॉ० नारायण उराँव द्वारा इस दिशा में कार्य किया
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कुँड़ुख़ तोलोङ सिकि को पहली बार आदिवासी समाज के सामने 24 सितम्बर 1993 को रखा गया

ज्ञातब्य है कि कुँड़ुख़ भाषा, झारखण्ड में द्वितीय राजभाषा एवं प० बंगाल में Official language के रूप में मान्यता प्राप्त है। झारखण्ड सरकार द्वारा वर्ष 2011 में कई भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का मान्यता दिया गया, जिनमें से कुँड़ुख़ भाषा भी एक है। इसी तरह 2018 में प० बंगाल में कई भाषाओं को Official language
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सकलराम तिरकी को बंगाल कैसे मिला 1500 एकड़ का खतियानी जमींदारी?

वर्तमान लोहरदगा जिला‚ कुड़ू थाना क्षेत्र के जिंगरी जोंजरो गांव के रहने वाला सकलराम तिरकी‚ एक उरांव परिवार में जन्मा् एवं पला–बढ़ा तथा एक मजदूर किसान का बेटा को जब अपने गांव–परिवार की गरीबी में अपने गांव से दूर जाने के लिए विवस होना पड़ा तो वह रास्ता ढूँढ़ते हुए बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र अर्थात
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कुँड़ुख़ भाषा की लिपि‚ तोलोंग सिकि है – बिहार जनजातीय कल्याण शोध संस्थान

ज्ञात हो कि बिहार जनजातीय कल्याण शोध संस्थान‚ मोरहाबादी‚ राँची के सभागार में “कुँडख़ भाषा-साहित्य-लिपि : दशा और दिशा” विषयक कार्यशाला दिनांक 19 सितम्बर 1998‚ दिन शनिवार को सम्पन्न हुआ। यह कार्यशाला‚ जनजातीय कल्याण शोध संस्थान‚ राँची तथा बिहार शिक्षा परियोजना‚ रातू‚ रांची के संयुक्त तत्वधान में बुलाया गया था। इस कार्यशाला में जनजातीय कल्याण
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