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कुँड़ुख़ व तोलोंग सिकि पर क्या कहा था डॉ मुन्डा व डॉ मिंज ने

यह आलेख पद्मश्री डॉ रामदयाल मुण्डा एवं साहित्य अकादमी सम्मान (कुँड़ुख़ भाषा) से सम्मानित डॉ निर्मल मिंज का कुँड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि के विकास में उनके योगदान एवं उनके विचार को केंद्रित करके लिखा गया है। डॉ मुण्डा ने कहा था- ‘हमारे देश के आदिवासियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के लिए एक सामान्य
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आधुनिक कुँड़ुख़ व्याकरण: एक पुस्तक परिचर्चा

कुँडु़ख़ कत्था, द्रविड़ भखा खन्दहा ता ओण्टा अद्दी कत्था तली। ई कत्था गही ओःरे एका बेसे मंज्जा, का एकसन मंज्जा, का ने नंज्जा, का एका आःलर नंज्जर, इबड़ा मेनता (प्रश्न) गही थाह अक्कुन गूटी अरगी मना। पुरखर बाःचका रअ़नर – धरमे सवंग आःलारिन सिरजन-बिरजन नंज्जा अरा संग्गे-संग्गे आःलारिन कुँड़ुख़ कत्था हूँ सिखाबाःचा। बेड़ा सिरे आर,
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श्रद्धेय डा॰ निर्मल मिंज की श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी सात कविताएं (तोलोंग सिकि एवं देवनागरी में)

श्रद्धेय डॅा॰ निर्मल मिंज की इन कविताओं में से 1ली कविता “उज्जकना पूंप लेखआ” में अपने व्य॰क्तिगत एवं पारिवारिक जीवन पर आधारित विचार है। 2री कविता “कुकई झील (फिनलैंड)” में विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्र फिनलैंड की धरती में भी कुँड़ुख़ में सोचते हुए कविता रचना किये हैं। 3री कविता में “तेताली मन्न तेंग्गाोली”
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संस्कृत-हिन्दी शब्दों को तोलोंग सिकि में लिप्यन्तरण हेतु जानकारियाँ

ध्यातब्य हो कि आदिवासी भाषाओं में से कुँड़ुख़ भाषा की अपनी विशिष्ट शैली एवं विशेषताएँ हैं। इस विशिष्ट पहचान पर आधारित इस भाषा की लिपि, तोलोंग सिकि विकसित हुर्इ है। यह तथ्य है कि कुँड़ुख़ भाषा में कर्इ ध्वनियाँ है जिसे दिखलाने के लिए रोमन एवं देवनागरी लिपि में लिपि चिन्ह नहीं हैं। रोमन लिपि
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देवनागरी में कुँड़ुख़ भाषा की लेखन समस्या और समाधान

कुँड़ुख़ भाषा की लेखन समस्या और गिनती को सुगम एवं सरल करने हेतु अब तक कर्इ पहल हुए। इस क्रम में दिनांक 26.08.2000 को जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची के सभागार में सम्पन्न हुए कार्यशाला में शून्य (0) का नामकरण ‘निदि’ रखा गया। उसके बाद दिनांक 24.09.2001 को पुन: जनजातीय एवं क्षेत्रीय
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कुँड़ुख़ (उराँव) सामाजिक परम्परा में धर्म का अर्थ ?
विगत दो दशक से परम्रागत आदिवासी समाज आत्मोत्थान के दौर से गुजर रहा है। झारखण्ड आन्दोलन से लेकर अबतक सामाजिक एवं धार्मिक जागरण के नामपर अनेकानेक विचार-गोश्ठी एवं रैलियाँ आयोजित की गर्इ। लोग इन विचार गोश्ठियों में आते और चले जाते। धीरे-धीरे अब ये धुंंध के बादल छंटने लगे हैं। गांव के बुर्जुग, शिक्षाविद, धर्म
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कुँड़ुख़ (उराँव) परम्परा में अध्यात्मिक मान्यताएँ
साधरणतया, लोग कहा करते हैं – आदिवासियों का कोर्इ धर्म नहीं है। इनका कोर्इ आध्यात्मिक चिंतन नहीं है। इनका विश्वास एवं धर्म अपरिभाशित है। ये पेड़-पोधों की पूजा करते हैं …. आदि, आदि। इस तरह के प्रश्नों एवं शंकाओं को प्रोत्साहित करने वालों से अगर पूछा जाय – क्या, वे अपने विश्वास, धर्म आदि
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लरका आंदोलन का अमर शहीद वीर बुधू भगत और अंगरेजी बंदूक

भारत की आजादी की लड़ाई में सन् 1857 या उसके बाद, देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले वीर शहीदों में कुछ के नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे गए हैं। किन्तु 1857 ई. से पहले और बाद भी आदिवासी समुदायों के वीरों के अधिकांश नाम गुमनामी के ढेर में छिपा
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करम परब गही ख़ीरी (करम त्योहार की कहानी)

बअ़नर – हुल्लो परिया नु ओरोत कुँड़ुख़ बे:लस ही रा:जी नु ओंगओल अनभनियाँ रा:जी कीड़ा मंज्जा। चेंप-झड़ी मल पुर्इंका ती खितीपुती मल मना लगिया। तूसा-झरिया, खाड़-ख़ोसरा, कूबी-पोखारी उरमी ख़ाया लगिया। मन्न-मास ही खं़जपा हूँ नठारआ हेल्लरा। ओना-मोख़ा गे मल ख़खरना ती टोड़ंग-परता ता अड़ख़ा-चे:खे़ल अरा बोकला गुट्ठीन मो:ख़र, आलर एकअम बेसे उल्ला खेपआ लगियर। चान-चान,
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गुरूभक्त एकलव्य और गुरू द्रोणाचार्य

(माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ द्वारा माह जनवरी 2011 में दिये गए एक अभूतपूर्व फैसले के पश्चा1त् महान आदिवासी जननायक, गुरूभक्त एकलव्य के स्मृति में गुरूभक्त एकलव्य जयंती सप्ताह के अवसर पर समर्पित) : एक कहावत है – ‘‘ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं।’’ यह कहावत ‘‘एकलव्य’’
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- KURUX PHONETIC READER कुड़ुख़ भाषा एवं व्याकरण को समझने के लिएयह पुस्तक KURUX PHONETIC READER के नाम से मई 1985 में CIIL MYSORE द्वारा प्रकाशित हुआ है। इसका प्रथम संस्करण का समय, 40 वर्ष एवं 10 महीने से अधिक है। आदिवासी भाषा में शोध कर रहे शोधकर्ताओं द्वारा इस पुस्तक की मांग को देखते हुए कुड़ुख़ भाषा विज्ञान की इस आधार स्तंभ पुस्तक को सामान्य… Read more: KURUX PHONETIC READER कुड़ुख़ भाषा एवं व्याकरण को समझने के लिए
- जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विकास मंच का स्थापना दिवस संपन्नदिनांक 01.04.2026, दिन बुधवार को जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विकास मंच का स्थापना दिवस फादर कामिल बुल्के पथ रांची में स्थित सत्यभारती के सभागार में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर नए अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चयन किया गया। समारोह में रांची विश्वविद्यालय के नागपुरी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. वीरेंद्र महतो को मंच का अध्यक्ष… Read more: जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विकास मंच का स्थापना दिवस संपन्न
- कुड़ुख़ टाइम्स का 17वां अंक प्रकाशित हुआकुड़ुख़ टाइम्स का 17वां अंक आप पाठकों के सामने है। यह अंक अपने नये स्वरूप में आप पाठकों के लिए रोचक होगा। कुड़ुख़ संस्कृति एवं नेगचार को असम के डिब्रूगढ़ क्षेत्र में रहने वाले उरांव लोगों को जानिए। साथ ही तमिल-भाषी डॉ स्टीफन जी द्वारा इतिहास के पन्नों पर शोध परक लेख देखने को मिलेगा।… Read more: कुड़ुख़ टाइम्स का 17वां अंक प्रकाशित हुआ
- कुडुख़ भाषा की लिपि “तोलोड सिकि” में कुडुख़ प्रवेशिका पुस्तक “अयंग कोंयछा” प्रकाशितकुडुख़ भाषा की लिपि “तोलोड सिकि” में कुडुख़ प्रवेशिका पुस्तक “अयंग कोंयछा” केतृतीय संस्करण के प्रकाशन पर मुझे एक विशिष्ट उर्जा की अनुभूति हो रही है। मैं अपने छात्र जीवनके समय में वर्ष 1989 में कुडुख़ समाज की स्थिति के बारे विचार करते हुए कुडुख़ भाषा एवं संस्कृतिके संरक्षण तथा संवर्द्धन हेतु कार्य करने का… Read more: कुडुख़ भाषा की लिपि “तोलोड सिकि” में कुडुख़ प्रवेशिका पुस्तक “अयंग कोंयछा” प्रकाशित
- Kurukh Times की डिजिटल पत्रिका अंक 16 प्रकाशित हुआपूर्व के अंकों की तरह पत्रिका का 16वां अंक प्रकाशित हो गया है। इसमें तोलोंग सिकि लिपि में रोचक सामग्री शामिल किये गय हैं। आशा है अन्य अंकों की तरह इस अंक को भी आपका भरपूर प्यार मिलेगा। इसे आप इस पन्ने पर देख सकते हैं। आप चाहें तो इसे अपने पीसी या मोबाइल में… Read more: Kurukh Times की डिजिटल पत्रिका अंक 16 प्रकाशित हुआ