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आदिवासी मौसम पुर्वानुमान पर जैव प्रौद्योगिकी विज्ञान आधारित शोध की आवश्यकता पर विचार हो

वातावरण हर समय बदल रहा हैं। वैश्विक मौसम पैटर्न को देखकर मौसम विज्ञानी ध्रुवीय परिक्रमा करने वाले उपग्रह की मदद से भविष्य की सात दिनों का 80 प्रतिशत तक सटीक मौसम पूर्वानुमान करते हैं। पर दस दिन या उससे अधिक समय का पूर्वानुमान केवल आधे समय के लिए ही सही होता है। किन्तु मौसम की
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गांव-समाज में सुधार, एकता और एजेंडा से आदिवासी बच सकते हैं – सालखन मुर्मू

संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित 1994 से आदिवासी अस्तित्व, पहचान, हिस्सेदारी आदि को समझने, सहयोग करने और संवर्धन करने हेतु दुनिया भर में विभिन्न देश और आदिवासी 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 13 सितंबर 2007 को विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा- पत्र भी जारी किया है। संयुक्त राष्ट्र ने 2022 से
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पिता की संपत्ति पर बेटी का अधिकार : एक उराँव आदिवासी महिला की कलम से

देश की आजादी के बाद भारत में नया संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और कई पुराने छोटे-बड़े रियासत एक झण्डे के नीचे आ गये। इस नव निर्माण में लोगों के बीच, संविधान बनने के पूर्व से चले आ रहे हिन्दु पर्सनल लॉ, मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाई विवाह कानुन इत्यादि सामाजिक एवं सम्प्रदायिक कानून
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प्रकृति और कुंडुख भाषा विकास

भारतीय भूमि की यह विशिष्टता है कि यहाँ की भूमि में पानी और वाणी की विविधता है। भारतीय उपमहाद्वीप में कुड़ुख भाषी आदिवासी समूह निवास करते हैं। इस समूह की खास बात है कि यह प्रकृति द्वारा अनुशासित है। कुड़ुख भाषी जनजीवन में प्रकृति और मानव के मध्य का मधुर अंतर्सम्बंध स्पष्ट दिखलाई पड़ता है।
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नयी शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं का स्थान

सार: किसी भी भाषा के लुप्त होने या उसके संकटग्रस्त श्रेणी में आ जाने के परिणाम बहुत दूरगामी होते हैं। भाषा का एक-एक शब्द महत्त्वपूर्ण होता है। प्रत्येक शब्द अपने पीछे संस्कृति की एक लंबी परंपरा को लेकर चलता है। इसलिए भाषा लुप्त होते ही संस्कृति पर खतरा मंडराने लगता है। संस्कृति और उस भाषा
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं मातृभाषा शिक्षा

भारतीय संविधान के चौथे भाग उल्लिखित नीति निदेशक तत्वों में कहा गया है कि प्राथमिक स्तर पर सभी बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षण की व्यवस्था की जाए। सामान्य परिचय :- जब देश 15 अगस्त 1947 ई० को स्वतंत्र हुआ, तभी से ही भारत में शिक्षा नीति पर जोर दिया जा रहा है। सन् 1948 ई० में
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धुमकुड़िया कोरना अरा पूरना उल्ला (धुमकुड़िया प्रवेश तथा पूर्णता दिवस)

बअ़नर माघ चन्ददो नु ख़द्दारिन धुमकुड़िया मंक्खा लगियर अरा ख़द्दर माघ चन्द्दो नु धुमकुड़िया कोरआ लगियर। एन्नेम माघ पुनई गेम जोंख़ रअ़उर गही माघ पूरआ लगिया दरा पुना अड्डा नु मलता पुना चान नु माघ पुनई ख़ोःख़ा ती जोंख़ रअ़ना ओरे मना लगिया। 1. धुमकुड़िया एन्दरा तली ? (धुमकुड़िया क्या है ?) उत्तर –
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साम्राज्यवादी धर्मों का आक्रमण और बिखरों को समेटते प्राकृतिक आदिवासी

पहले, प्रथम आदिवासी और प्रकृति दोनों एक ही बात थी. कोई भी एक को दूसरे की बिना कल्पना नहीं कर सकते थे. आज के समय में थोड़ा बदलाव आया भी है तो आदिवासी और प्रकृति को आप अन्योन्याश्रिता के तौर पर देख सकते हैं, जो की अंधाधुंध औद्योगीकरण और शहरीकरण के प्रभाव में थोड़ा कमजोर
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प्राकृतिक आस्था और आदिवासी अध्यात्म का प्रतीक “सरना”

“सरना” शब्द आज पूरी दुनिया जानती है| इस शब्द के गहराई और शुरुवात में जाएँ तो शायद ही ये शब्द किसी आदिवासी भाषा में मिले, लेकिन आदिवासी समुदायों और गैर आदिवासी समुदायों के संवादों से उभरने वाले शब्दों को गौर करें तो आप पाएंगे की ‘सरना’ शब्द यहीं कहीं से उत्पन्न हुआ है| ‘सरना’, सिर्फ
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- ओर- करम करम करले बहीन..आईज तारीख 08 मार्च 2026 दिन एतवार के कुड़ुख़ टाइम्स डॉट कॉम कर पुनह परकाशन कर बेरा में टी आर एल ब्लॉग ले उरांव अखरा से तीन गो गावल गीत के नागपुरी भखा में बताल हय। इके धेयान देवब और गुनगुनाब अपने मन सउब – 1 ओर छोट-मोटे तेतईर गे आयो,भिंजल छांहईर गे आयो ।2।घुराल… Read more: ओर- करम करम करले बहीन..
- झारखंड: क्या आदिवासियों को लालच में फँसाकर ईसाई बनाया जा रहा है?राँची के कोर्नेलियस मिंज को लोग करन कहते हैं. उनका परिवार सरना आदिवासी था लेकिन बाद में ईसाई बन गया. हालाँकि कोर्नेलियस के घर में अब भी कई लोग सरना हैं. यह परिवार साथ में सरहुल भी मनाता है और क्रिसमस भी. आपस में शादियाँ भी होती हैं. करन कहते हैं कि जब सरना और… Read more: झारखंड: क्या आदिवासियों को लालच में फँसाकर ईसाई बनाया जा रहा है?
- झारखंड साहित्य अकादमी पुरस्कार वितरण 2026 – तोलोंग सिकि के जनक डॉ नारायण सम्मानितरांची: आज दिनांक 21.02.2026 दिन शनिवार को प्रेस क्लब रांची में अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर अखिल झारखंड साहित्य अकादमी पुरस्कार सम्मान 2026 झारखंड के 9 साहित्यकारों के रचनाकारों के साथ ओल चिकि लिपि के रचयिता श्रद्धेय पं रघुनाथ मुर्मू तथा वरांग चिति के रचयिता श्रद्धेय कोल लाको बोदरा को मरणोपरांत उनके वंशजों को… Read more: झारखंड साहित्य अकादमी पुरस्कार वितरण 2026 – तोलोंग सिकि के जनक डॉ नारायण सम्मानित
- औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति क्यों चाहिए?आजादी के पचहत्तर साल बाद भी भारत अंग्रेज और अंग्रेजियत (औपनिवेशिक गुलामी) से मुक्त नहीं हुआ है”—इस उक्ति को यदि गहराई से समझें, तो यह किसी भौतिक गुलामी की नहीं बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक और वैचारिक गुलामी की ओर संकेत करती है। भारत ने 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त की, परंतु औपनिवेशिक सत्ता द्वारा… Read more: औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति क्यों चाहिए?
- हमारे कुँड़ुख भाषा-सेवियों के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान के कुछ रास्ते यह जानकर बहुत प्रेरणा मिलती है कि गुमला, रांची, लातेहार और लोहरदगा के युवा गणित (Maths) जैसे कठिन विषय को भी कुँड़ुख में ढाल रहे हैं। प्रसिद्ध अफ्रीकी लेखक चिंतक न्गुगी वा थ्योंगो ने हमेशा यही कहा कि – “भाषा केवल साहित्य के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान और तर्क के लिए भी होनी चाहिए” ।… Read more: हमारे कुँड़ुख भाषा-सेवियों के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान के कुछ रास्ते
