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सिलागामी (सिलागांई) धरती का लाल क्रांतिकारी क्यों बना?

बीर बुधू भगत, बचपन से ही गरीबी, भ्ाुखमरी के साथ जमींदार, साहुकार, महाजन, बनिया अर्थात् गैर आदिवासियों की बर्बरता को देखे। वे देखे कि किस प्रकार तैयार फसल को जमींदार उठा ले जाते थे, और गरीब गाँव वालों के घर कर्इ-कर्इ दिनों तक चुल्हा नहीं जल पाता, गाँव के बच्चे, बुढ़े सभी भ्ाूख से बिलखते
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जतरा टाना भगत

चउगिरदा हरियर टोड़ंग परता रहचा। नाखो कोंड़ा परता दिम हरियर एथेरआ लगिया। मन्ने मास ती झबरारका अकय दव शोभ’आ लगिया। सलय-सलय एका नगद ताका तागर’आ लगिया। झरना हूँ हहा-हीही बाहरनुम डण्डी पाड़ा लगिया। ओ:ड़ा एका नगद चेरेबेरे मना लगिया। अकय सोहान परता मझी नुम ओन्टा पद्दा रहचा। आ पद्दा ही नामे चिंगरी पुना टोला रहचा।
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कृषि कार्यों में महिलाओं की भागीदारी

भारत के राष्ट्रीय विकास में कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण योगदान रहा है तथा आनेवाले वर्षों में कृषि पर आधारित उद्योगों की प्रबल संभावना के मद्देनजर आने वाले समय मे इसके और महत्वपूर्ण होने की संभावना है। कृषि अर्थव्यवस्था का संचालन ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाली आबादी द्धारा किया जाता, जिसमें वयस्क पुरूषों एवं महिलाओं
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ख़द्दी परब (सरहुल त्योहार)

नमहँय देश भारत नू अकय बग्गे भख़ा कछनखरऊ अरा नने किसिम गहि संस्कृति खोड़हा नू मेसेरका रअ़र्इ। हुल्लो परिया तिम इसन नने रकम जइतर तंगआ-तंगआ भख़ा-संस्कृति, परम्परा अरा विश्वासन अङिय’अर संग्गे-संग्गे रअ़ते बरआ लगनर। र्इवन्दा बेड़ा नू अकय किय्या-मर्इय्या मंज्जा। एका-एका जइतर गहि भख़ा-संस्कृति, इतिङख़ीरी गहि कगद नूम रर्इह केरा, पहें एका-एका खोड़हा गहि आ:लर,
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करम परब गही ख़ीरी (करम त्योहार की कहानी)

बअ़नर – हुल्लो परिया नु ओरोत कुँड़ुख़ बे:लस ही रा:जी नु ओंगओल अनभनियाँ रा:जी कीड़ा मंज्जा। चेंप-झड़ी मल पुर्इंका ती खितीपुती मल मना लगिया। तूसा-झरिया, खाड़-ख़ोसरा, कूबी-पोखारी उरमी ख़ाया लगिया। मन्न-मास ही खं़जपा हूँ नठारआ हेल्लरा। ओना-मोख़ा गे मल ख़खरना ती टोड़ंग-परता ता अड़ख़ा-चे:खे़ल अरा बोकला गुट्ठीन मो:ख़र, आलर एकअम बेसे उल्ला खेपआ लगियर। चान-चान,
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गुरूभक्त एकलव्य और गुरू द्रोणाचार्य

(माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ द्वारा माह जनवरी 2011 में दिये गए एक अभूतपूर्व फैसले के पश्चा1त् महान आदिवासी जननायक, गुरूभक्त एकलव्य के स्मृति में गुरूभक्त एकलव्य जयंती सप्ताह के अवसर पर समर्पित) : एक कहावत है – ‘‘ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं।’’ यह कहावत ‘‘एकलव्य’’
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बीजिरपो (श्राद्ध हेतु एकत्र किया गया धन)

समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में समय-समय पर खबर छपती है – एक परिवार, पैसे की कमी के चलते अपने कांधे पर ढोकर अपने परिजन का अंतिम संस्कार को ले गया अथवा एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार के लिए कोर्इ मद्दगार नहीं मिला तो बच्चे और महिलाएँ, पड़ोस के एक ठेले में लेकर गये आदि, आदि।
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मध्यप्रदेश का 40 फीसदी जंगल निजी कंपनियों को देने का फैसला

भारत सरकार हो या राज्य सरकारें, हर वक्त उनका एक ही नारा होता है आदिवासियों का कल्याण. लेकिन उनका कल्याण करते-करते ये सरकारें अकसर उनको उनके गांव-खेत-खलिहान और उनके जंगलों से बेदखल कर देती हैं. इसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश का है. यहां जलवायु परिवर्तन से होने वाले दुष्प्रभावों को कम करने, राज्य के जंगलों की
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सरना धर्म कोड के लिए रैली कोलकाता में

सरना धर्मगुरू बंधन तिग्गा का आव्हान् : पश्चिम बंगाल: सरना धर्म कोड की मांग करते हुए कोलकाता के नेताजी स्टेडियम में आदिवासी समाज की बड़ी रैली का आयोजन 03 जनवरी 2021 को किया गया। इस अवसर पर सरना धर्मगुरू बंधन तिग्गा ने मांग की कि प. बंगाल की राज्य सरकार सरना धर्म कोड सदन से पारित
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बच्चों की कविताएं

बच्चों की कविताओं का चलन आदिवासी समाज में अरसे से चला आ रहा है। अक्सर बोल में या गीत के स्वर में इसका स्वरूप मिलता रहा है। एक से बढ़कर एक खूबसूरत और ज्ञानवर्द्धक बाल गीत चलन में सुना जाता रहा है। लेकिन अब जब कुंड़ुख समाज अपनी लिपि अपनी भाषा विकसित कर चुके है
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- झारखंड साहित्य अकादमी पुरस्कार वितरण 2026 – तोलोंग सिकि के जनक डॉ नारायण सम्मानितरांची: आज दिनांक 21.02.2026 दिन शनिवार को प्रेस क्लब रांची में अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर अखिल झारखंड साहित्य अकादमी पुरस्कार सम्मान 2026 झारखंड के 9 साहित्यकारों के रचनाकारों के साथ ओल चिकि लिपि के रचयिता श्रद्धेय पं रघुनाथ मुर्मू तथा वरांग चिति के रचयिता श्रद्धेय कोल लाको बोदरा को मरणोपरांत उनके वंशजों को… Read more: झारखंड साहित्य अकादमी पुरस्कार वितरण 2026 – तोलोंग सिकि के जनक डॉ नारायण सम्मानित
- औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति क्यों चाहिए?आजादी के पचहत्तर साल बाद भी भारत अंग्रेज और अंग्रेजियत (औपनिवेशिक गुलामी) से मुक्त नहीं हुआ है”—इस उक्ति को यदि गहराई से समझें, तो यह किसी भौतिक गुलामी की नहीं बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक और वैचारिक गुलामी की ओर संकेत करती है। भारत ने 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त की, परंतु औपनिवेशिक सत्ता द्वारा… Read more: औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति क्यों चाहिए?
- हमारे कुँड़ुख भाषा-सेवियों के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान के कुछ रास्ते यह जानकर बहुत प्रेरणा मिलती है कि गुमला, रांची, लातेहार और लोहरदगा के युवा गणित (Maths) जैसे कठिन विषय को भी कुँड़ुख में ढाल रहे हैं। प्रसिद्ध अफ्रीकी लेखक चिंतक न्गुगी वा थ्योंगो ने हमेशा यही कहा कि – “भाषा केवल साहित्य के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान और तर्क के लिए भी होनी चाहिए” ।… Read more: हमारे कुँड़ुख भाषा-सेवियों के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान के कुछ रास्ते