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  • तोलोंग सिकि (लिपि) का आधार

    तोलोंग सिकि (लिपि) का आधार

    तोलोंग सिकि एक वर्णात्मक लिपि है। इसमें‚ उच्चारण के अनुसार लिखा एवं पढ़ा जाता है। इसमें हलन्त का प्रयोग नहीं होता है। इस लिपि को कुँड़ुख़ भाषियों ने कुँड़ुख़ भाषा की लिपि की सामाजिक स्वीकृति प्रदान की है तथा झारखण्ड सरकार द्वारा कुँड़ुख़ भाषा की लिपि की वैधानिक मान्यता देकर विद्यालयों में पठन-पाठन का अवसर

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  • झारखण्ड आंदोलनकारियों की मांग पर आदिवासी भाषा की लिपि ‘तोलोङ सिकि’ पर भाषाविद डॉ॰ फ्रांसिस एक्का से विमर्श

    झारखण्ड आंदोलनकारियों की मांग पर आदिवासी भाषा की लिपि ‘तोलोङ सिकि’ पर भाषाविद डॉ॰ फ्रांसिस एक्का से विमर्श

    झारखण्ड आंदोलनकारियों की मांग पर आदिवासी भाषा की नई लिपि तोलोङ सिकि, विषय पर भाषाविद डॉ॰ फ्रांसिस एक्का से विमर्श : झारखण्ड आंदोलनकारियों की मांग पर आदिवासी भाषा की नई लिपि तोलोङ सिकि, विषय पर विचार–विमर्श करने के लिए केन्द्रीसय भारतीय भाषा संस्थासन‚ मैसूर  (भारत सरकार) के भाषाविद‚ प्रोफेसर सह निदेशक डॉ॰ फ्रांसिस एक्का से मैं

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  • सैन्दां धुमकु‍ड़ि‍या में कुड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि

    सैन्दां धुमकु‍ड़ि‍या में कुड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि

    धुमकु‍ड़ि‍या सैन्दां, सिसई, गुमला में बच्चों को कुड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि सिखलाते हुए शिक्षक एवं छात्रगण धुमकु‍ड़ि‍या सैन्दां, सिसई, गुमला में बच्चों को कुड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि सिखलाते हुए शिक्षक एवं छात्रगण धुमकु‍ड़ि‍या सैन्दां, सिसई, गुमला में बच्चों को कुड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि सिखलाते हुए शिक्षक एवं छात्रगण धुमकु‍ड़ि‍या सैन्दां, सिसई, गुमला में बच्चों को

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  • संस्कृत, हिन्दी एवं कुँड़ुख़ भाषा का वर्णमाला : एक तुलनात्मक अध्ययन

    संस्कृत, हिन्दी एवं कुँड़ुख़ भाषा का वर्णमाला : एक तुलनात्मक अध्ययन

    यह आलेख‚ कुँड़ुख़ भाषा की लिपि तोलोंग सिकि की वर्णमाला के साथ संस्कृत एवं  हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी की वर्णमाला के साथ एक तुलनात्‍मक अध्ययन है। इस लेख के माध्‍यम से कुँड़ुख़ भाषा की लिपि के संबंध में उठने वाले कई प्रश्‍नों के उत्‍तर को समझने का प्रयास है।   संस्कृत, हिन्दी एवं कुँड़ुख़ भाषा

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  • कुँड़ुख़ व तोलोंग सिकि पर क्‍या कहा था डॉ मुन्‍डा व डॉ मिंज ने

    कुँड़ुख़ व तोलोंग सिकि पर क्‍या कहा था डॉ मुन्‍डा व डॉ मिंज ने

    यह आलेख पद्मश्री डॉ रामदयाल मुण्डा एवं साहित्य अकादमी सम्मान (कुँड़ुख़ भाषा) से सम्मानित डॉ निर्मल मिंज का कुँड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि के विकास में उनके योगदान एवं उनके विचार को केंद्रित करके लिखा गया है। डॉ मुण्‍डा ने कहा था- ‘हमारे देश के आदिवासियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के लिए एक सामान्य

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  • आधुनिक कुँड़ुख़ व्याकरण: एक पुस्तक परिचर्चा

    आधुनिक कुँड़ुख़ व्याकरण: एक पुस्तक परिचर्चा

    कुँडु़ख़ कत्था, द्रविड़ भखा खन्दहा ता ओण्टा अद्दी कत्था तली। ई कत्था गही ओःरे एका बेसे मंज्जा, का एकसन मंज्जा, का ने नंज्जा, का एका आःलर नंज्जर, इबड़ा मेनता (प्रश्न) गही थाह अक्कुन गूटी अरगी मना। पुरखर बाःचका रअ़नर – धरमे सवंग आःलारिन सिरजन-बिरजन नंज्जा अरा संग्गे-संग्गे आःलारिन कुँड़ुख़ कत्था हूँ सिखाबाःचा। बेड़ा सिरे आर,

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  • श्रद्धेय डा॰ निर्मल मिंज की श्रद्धांजलि‍ स्वरूप उनकी सात कविताएं (तोलोंग सिकि एवं देवनागरी में)

    श्रद्धेय डा॰ निर्मल मिंज की श्रद्धांजलि‍ स्वरूप उनकी सात कविताएं (तोलोंग सिकि एवं देवनागरी में)

    श्रद्धेय डॅा॰ निर्मल मिंज की इन कविताओं में से 1ली कविता “उज्जकना पूंप लेखआ” में अपने व्य॰क्तिगत एवं पारिवारिक जीवन पर आधारित विचार है। 2री कविता “कुकई झील (फिनलैंड)” में विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्र फिनलैंड की धरती में भी कुँड़ुख़ में सोचते हुए कविता रचना किये हैं। 3री कविता में “तेताली मन्न  तेंग्गाोली”

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  • संस्कृत-हिन्दी शब्दों को तोलोंग सिकि में लिप्यन्तरण हेतु जानकारियाँ

    संस्कृत-हिन्दी शब्दों को तोलोंग सिकि में लिप्यन्तरण हेतु जानकारियाँ

    ध्यातब्य हो कि आदिवासी भाषाओं में से कुँड़ुख़ भाषा की अपनी विशिष्ट शैली एवं विशेषताएँ हैं। इस विशिष्ट पहचान पर आधारित इस भाषा की लिपि, तोलोंग सिकि विकसित हुर्इ है। यह तथ्य है कि कुँड़ुख़ भाषा में कर्इ ध्वनियाँ है जिसे दिखलाने के लिए रोमन एवं देवनागरी लिपि में लिपि चिन्ह नहीं हैं। रोमन लिपि

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  • देवनागरी में कुँड़ुख़ भाषा की लेखन समस्या और समाधान

    देवनागरी में कुँड़ुख़ भाषा की लेखन समस्या और समाधान

    कुँड़ुख़ भाषा की लेखन समस्या और गिनती को सुगम एवं सरल करने हेतु अब तक कर्इ पहल हुए। इस क्रम में दिनांक 26.08.2000 को जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, राँची विश्‍वविद्यालय, राँची के सभागार में सम्पन्न हुए कार्यशाला में शून्य (0) का नामकरण ‘निदि’ रखा गया। उसके बाद दिनांक 24.09.2001 को पुन: जनजातीय एवं क्षेत्रीय

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  • कुँड़ुख़ (उराँव) सामाजिक परम्परा में धर्म का अर्थ ?

    विगत दो दशक से परम्रागत आदिवासी समाज आत्मोत्थान के दौर से गुजर रहा है। झारखण्ड आन्दोलन से लेकर अबतक सामाजिक एवं धार्मिक जागरण के नामपर अनेकानेक विचार-गोश्ठी एवं रैलियाँ आयोजित की गर्इ। लोग इन विचार गोश्ठियों में आते और चले जाते। धीरे-धीरे अब ये धुंंध के बादल छंटने लगे हैं। गांव के बुर्जुग, शिक्षाविद, धर्म

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