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  • कुँड़ुख पेंटिंग को नवजीवन देती – कलाकार सुमन्ती उराँव

    कुँड़ुख पेंटिंग को नवजीवन देती – कलाकार सुमन्ती उराँव

    यूँ कलाकार और कला की कोई सीमा नहीं। लेकिन जब कोई कलाकार लगभग लुप्त हो गई किसी कला को पुनर्जीवित कर देता कलाकार समाज और कला जगत के लिए विशिष्ट हो जाता है। ऐसी ही एक कलाकार है सुमन्ती देव भगत, जो भोपाल में रहती हैं। सुमन्ती ने अपनी वेश-भूषा तक को उराँव संस्कृति के

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  • कुँडुख भाषा की लिपि : तोलोंग सिकि

    कुँडुख भाषा की लिपि : तोलोंग सिकि

    कुँडुख भाषा की लिपि : तोलोंग सिकि तोलोंग सिकि एक लिपि है। यह लिपि, भारतीय आदिवासी आंदोलन तथा झारखण्ड का छात्र आंदोलन की देन है। इस लिपि को आदिवासी कुंडुख (उराँव) समाज ने अपनी भाषा की लिपि के रूप में स्वीकार किया और पठन-पाठन में शामिल कर लिया है। इस लिपि के प्रारूपण में मध्य

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  • सरना धर्मकोड पर केंद्र और राज्‍य दोनों आदिवासियों को धोखा रहे हैं : सालखन मुर्मू

    सरना धर्मकोड पर केंद्र और राज्‍य दोनों आदिवासियों को धोखा रहे हैं : सालखन मुर्मू

    – अब वक्‍त आ गया है कि राज्‍य की हेमन्‍त सरकार आदिवासी हित में आगे आये और केंद्र सरकार समय रहते देश भर के 15 करोड़ आदिवासियों की भावना को ध्‍यान में रखते हुए आदिवासी संगठनों से धर्म कोड पर वार्ता शुरू करे वरना.. – 31 जनवरी 2021 को राष्ट्रव्यापी रेल-रोड चक्का जाम होगा जोरदार

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  • कुँड़ुख तोलोङ सिकि की विकास यात्रा और राजी पड़हा, भारत का उद्घोष

    कुँड़ुख तोलोङ सिकि की विकास यात्रा और राजी पड़हा, भारत का उद्घोष

    कुँड़ुख भाशा की लिपि तोलोङ सिकि के बारे में कहा जाता है कि यह लिपि, भारतीय आदिवासी आंदोलन एवं झारखण्ड का छात्र आंदोलन की देन है। इस लिपि का शोध एवं अनुसंधान पेशे से चिकित्सक डॉ0 नारायण उराँव द्वारा 1989 में आरंभ किया गया। उन्होंने पहली बार 1993 में सरना नवयुवक संघ, राँची द्वारा आयोजित,

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  • आदिवासी परम्परा एवं प्रकृति विज्ञान

    आदिवासी परम्परा एवं प्रकृति विज्ञान

    प्रस्तुत शीर्षक ‘‘आदिवासी परम्परा एवं प्रकृति विज्ञान’’ के द्वारा भारत देश में निवासरत आदिवासी समाज एवं उनकी जीवन गाथा में प्र.ति और उनका प्रेम को आप पाठकों तक बतलाने का यह मामूली सा प्रयास है। वैसे भारतीय संविधान में ‘‘आदिवासी’’ शब्द की परिभाशा स्पष्‍‍‍ट नहीं है फिर भी भारतीय मानस पटल पर यह शब्द प्रचलित एवं

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  • कुँड़ुख़ (उराँव) सामाजिक परम्परा में धर्म का अर्थ ?

    विगत दो दशक से परम्रागत आदिवासी समाज आत्मोत्थान के दौर से गुजर रहा है। झारखण्ड आन्दोलन से लेकर अबतक सामाजिक एवं धार्मिक जागरण के नामपर अनेकानेक विचार-गोश्ठी एवं रैलियाँ आयोजित की गर्इ। लोग इन विचार गोश्ठियों में आते और चले जाते। धीरे-धीरे अब ये धुंंध के बादल छंटने लगे हैं। गांव के बुर्जुग, शिक्षाविद, धर्म

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  • कुँड़ुख़ (उराँव) परम्परा में अध्यात्मिक मान्यताएँ

    साधरणतया, लोग कहा करते हैं – आदिवासियों का कोर्इ धर्म नहीं है। इनका कोर्इ   आध्यात्मिक चिंतन नहीं है। इनका विश्‍वास एवं धर्म अपरिभाशित है। ये पेड़-पोधों की पूजा करते हैं …. आदि, आदि। इस तरह के प्रश्‍नों एवं शंकाओं को प्रोत्साहित करने वालों से अगर पूछा जाय – क्या, वे अपने विश्‍वास, धर्म आदि

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  • उपेक्षित आदिवासी भाषाएं : 58 साल की शांति खलखो के संघर्ष की कहानी

    उपेक्षित आदिवासी भाषाएं : 58 साल की शांति खलखो के संघर्ष की कहानी

    27 साल पहले NET, JRF की पात्रता पानेवाली डॉ शांति खलखो के संघर्ष की कहानी, खुद उनकी जुबानी। रांची के जनजातीय भाषा विभाग में 12 साल तक बतौर प्रोफेसर पढ़ाती रही, लेकिन कभी बदले में उन्‍हें एक पैसा मेहनताना नहीं मिला। अब, एक बार फिर 18 जनवरी 2021 को 58 साल की उम्र में डॉ

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  • उड़ीसा के सुंदरगढ़ में आदिवासियों की जमीन हथियाने की कोशिश नाकाम

    उड़ीसा के सुंदरगढ़ में आदिवासियों की जमीन हथियाने की कोशिश नाकाम

    उड़ीसा के सुंदरगढ जिला कुंअरमुण्डा ब्लॉक अन्तर्गत गोबिरा गांव में 15 जनवरी, शुक्रवार शाम 5 बजे गोबिरा गांव  NH रोड चैक के सम्मुख आदिवासियों की जमीन को बाहर से आये गैर आदिवासियों ने गैर कानूनी ढंग से दखलाने की कोशिश कर रहे थें। फलत: गोबिरा गांव के लोगों ने राजी बेल बागी लाकड़ा राजी पड़हा

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  • लरका आंदोलन का अमर शहीद वीर बुधू भगत और अंगरेजी बंदूक

    लरका आंदोलन का अमर शहीद वीर बुधू भगत और अंगरेजी बंदूक

    भारत की आजादी की लड़ाई में सन् 1857 या उसके बाद, देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले वीर शहीदों में कुछ के नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे गए हैं। किन्तु 1857 ई. से पहले और बाद भी आदिवासी     समुदायों के वीरों के अधिकांश नाम गुमनामी के ढेर में छिपा

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