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सय बिमल टोप्पो की कुँड़ुख़ कविता तोलोंग सिकि एवं देवनागरी लिपि में

हाथी हाथी ! हाथी ! हाथी ! इदा हाथी, अदा हाथी इसन हाथी असन हाथी सगरे दुनिया नू हाथी मुंधवारे हाथी, ख़ोख़ा हाथी पईरी न पुतबारी हाथी टोड़ंग नू हाथी, पद्दा नू हूं हाथी लुका ओदआ, फटका चो’ड़ताअ़आ ब’आ – हटो बबा, बुढ़ा बबा पीछे हटो गनेस बबा. (गणेश) हाथीहाथी ! हाथी ! हाथी !इदा हाथी, अदा हाथीइसन हाथी असन हाथी सगरे दुनिया
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कुलदीप तिग्गा की कुंड़ुख़ कविता : देवनागरी लिपि एवं तोलोंग सिकि में

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श्रद्धांजलि : अद्दी कुँड़ख़ चाःला धुमकुडि़या पड़हा अखड़ा के कर्मठ कार्यकर्ता प्रकाश पन्ना पंकज नहीं रहे

रांची : सेवा निवृत यूनियन बैंक अधिकारी तथा अद्दी कुँड़ख़ चाःला धुमकुडि़या पड़हा अखड़ा‚ रांची के कर्मठ कार्यकर्ता का लम्बी बिमारी के बाद 30 जुलाई 2021 को दोपहर 1.30 बजे पल्स हॉस्पिटल‚ रांची में निधन हो गया। वे अपने पीछे पत्नी‚ दो बेटे एवं दो बेटियाँ छोड़ गये। वे ग्राम – लोंगा‚ पो0 – सातो‚
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कुँड़ुख़ तोलोंग सिकि के विकास की परिकल्पना 1989 में दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल‚ लहेरियासराय (बिहार) से हुआ

ज्ञातव्य है कि डॉ० नारायण उराँव का आवश्यक इंटरर्नशीप अवधि दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, लहेरियासराय (बिहार) में एम.बी.बी.एस. की परीक्षा पास करने के बाद फरवरी 1989 से फरवरी 1990 तक था। उस इंटर्नशीप अवधि में उन्होंने अपने चिकित्सीय कार्य के अतिरिक्त आदिवासी समाज के कई सामयिक प्रष्नों के प्रत्युत्तर में एक पुस्तक लिखी‚ जिसका
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जनजातीय भाषा विभागाध्यक्ष डॉ० मुण्डा द्वारा तोलोंग सिकि की पहली पुस्तक का लोकार्पण

दिनांक 13 अप्रैल 1994 को राँची कालेज‚ राँची के सभागार में सरना नवयुवक संघ‚ राँची के सौजन्य से आयोजित‚ सरहुल पूर्व संध्या के अवसर पर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग‚ रांची विश्वविद्यालय‚ रांची के विभागाध्यक्ष सह भाषाविद डॉ० रामदयाल मुण्डा द्वारा तोलोंग सिकि (लिपि) की पहली पुस्तक ‘‘कुड़ुख़ तोलोंग सिकि अरा बक्क गढ़न’’ को लोकार्पित
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कुँड़ुख़ तोलोङ सिकि का दुमका (संताल परगना) का प्रसिद्ध हिजला मेला में प्रदर्शनी

ज्ञातव्य है कि ब्रिटिश भारत में सन् 1885 में संताल परगना, जिला घोषित हुआ‚ जिसका मुख्यालय दुमका बना। कहा जाता है इसी संताल परगना जिला में पदस्थासपित एक अंगरेज आफिसर द्वारा दुमका में वर्ष के अंत में धान कटनी के बाद एक मेला का आयोजन कराया जाता था। जो देश की आजादी के बाद एक
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सर्वप्रथम 07 अक्टूबर 1993 को हिन्दी दैनिक ‘आज’ में तोलोङ सिकि के संबंध में विस्तृत लेख छपा

ज्ञातब्य है कि झारखण्ड अलग प्रांत आन्दोलन के छात्र नेताओं एवं बुदि्धजीवियों की राय थी कि आदिवासी भाषाओं की पहचान के लिए एक नई लिपि का विकास हो, पर यह कैसे हो या कौन करे, इस विषय पर सभी मौन रहे। इसी बीच पेशे से चिकित्सीक डॉ० नारायण उराँव द्वारा इस दिशा में कार्य किया
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कुँड़ुख़ तोलोङ सिकि को पहली बार आदिवासी समाज के सामने 24 सितम्बर 1993 को रखा गया

ज्ञातब्य है कि कुँड़ुख़ भाषा, झारखण्ड में द्वितीय राजभाषा एवं प० बंगाल में Official language के रूप में मान्यता प्राप्त है। झारखण्ड सरकार द्वारा वर्ष 2011 में कई भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का मान्यता दिया गया, जिनमें से कुँड़ुख़ भाषा भी एक है। इसी तरह 2018 में प० बंगाल में कई भाषाओं को Official language
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सकलराम तिरकी को बंगाल कैसे मिला 1500 एकड़ का खतियानी जमींदारी?

वर्तमान लोहरदगा जिला‚ कुड़ू थाना क्षेत्र के जिंगरी जोंजरो गांव के रहने वाला सकलराम तिरकी‚ एक उरांव परिवार में जन्मा् एवं पला–बढ़ा तथा एक मजदूर किसान का बेटा को जब अपने गांव–परिवार की गरीबी में अपने गांव से दूर जाने के लिए विवस होना पड़ा तो वह रास्ता ढूँढ़ते हुए बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र अर्थात
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परम्परागत आदिवासी मौसम पूर्वानुमान का प्रथम चरण सही

गुमला जिला‚ सिसई थाना क्षेत्र के सैन्दा गांव निवासी श्री गजेन्द्र उराँव (65 वर्ष) एवं सियांग गांव निवासी श्री बुधराम उराँव (70 वर्ष) द्वारा मई महीने में वर्ष 2021 के लिए अपने क्षेत्र के आसपास मौसम के बारे में मौसम पूर्वानुमान किया गया था जो प्रथम चरण में सही साबित हुआ। पूर्वानुमान कर्ता द्वय द्वारा
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- औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति क्यों चाहिए?आजादी के पचहत्तर साल बाद भी भारत अंग्रेज और अंग्रेजियत (औपनिवेशिक गुलामी) से मुक्त नहीं हुआ है”—इस उक्ति को यदि गहराई से समझें, तो यह किसी भौतिक गुलामी की नहीं बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक और वैचारिक गुलामी की ओर संकेत करती है। भारत ने 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त की, परंतु औपनिवेशिक सत्ता द्वारा… Read more: औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति क्यों चाहिए?
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