कुँड़ुख़ तोलोङ सिकि का दुमका (संताल परगना) का प्रसिद्ध हिजला मेला में प्रदर्शनी

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ज्ञातव्य है कि ब्रिटिश भारत में सन् 1885 में संताल परगना, जिला घोषित हुआ‚ जिसका मुख्यालय दुमका बना। कहा जाता है इसी संताल परगना जिला में पदस्थासपित एक अंगरेज आफिसर द्वारा दुमका में वर्ष के अंत में धान कटनी के बाद एक मेला का आयोजन कराया जाता था। जो देश की आजादी के बाद एक राजकीय मेला के रूप में प्रशासन द्वारा कराया जाता रहा, जिसका नाम हिजला मेला है। इसी कड़ी में वर्ष 1994 में सरकारी हिजला मेला 18 से 25 फरवरी को आयोजित हुआ था। इस मेला में ततकालीन दुमका सी. ओ. श्री वासिल खलखो की सहायता से ‘‘कुँड़ुख़ एवं संवरिया पहाडि़या भाषा की लिपि का आविष्कार’’ के नाम से एक प्रदर्शनी प्रभाग मिला, जहाँ दिनांक 18 से 25 फरवरी तक प्रदर्शनी लगाया गया। इस मेला का उद्घाटन तत्कालीन कैबिनेट मिनिस्टर श्री करमचन्द भगत के द्वारा सम्पन्न हुआ। निरीक्षण के दौरान माननीय मंत्री श्री करमचन्द भगत ने पूछा इसका आविष्कार कौन किया एवं कब किया ? 
इस प्रदर्शनी में तोलोंग सिकि का तकनीकी आधार स्तंभ ‘‘तोलोंग सिकि डिस्प्ले सिस्टम’’ अथवा ‘‘22 सेगमेंट डिस्प्ले सिस्टम’’ को पहली बार सामाजिक प्रदर्शनी हेतु रखा गया। यह डिस्प्ले सिस्टम ‘‘डण्डा कट्टना अनुष्ठान चिन्ह’’ पर आधारित है जिससे तोलोंग सिकि वर्णमाला के सभी लिपि चिन्हों को बखुबी डिस्प्ले किया जाता है। इन दोनों विषयों पर प्रदर्शनी में आये शिक्षाविद, पदाधिकारी एवं पत्रकारों द्वारा कई प्रश्नप पूछे गये। तोलोंग सिकि के सर्जक डॉ० नारायण उराँव द्वारा प्रश्नकर्ताओं के प्रश्नों  का यथा विवेक उत्तर देने का प्रयत्न किया गया। इससे कई लोग संतुष्ट हुए, तो कई प्रश्न शोध के दिशा तय करने में मददगार हुआ।
कुँड़ुख़ (उराँव) भाषी कई पदाधिकारी भी इस प्रदर्शनी में पहुँचे, जिनमे श्री देवेश भगत (कार्यपालक अभियन्ता, दुमका), श्री सुशील उराँव (उत्पाद अधीक्षक, दुमका), श्री रामकुमार बेक (बैंक पदाधिकारी) आदि। 
रिपोर्टर –
भुनेश्वर उराँव
सहायक शिक्षक,
जतरा टाना भगत विद्या मंदिर,
बिशुनपुर, घाघरा, गुमला।

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