सर्वप्रथम 07 अक्टूबर 1993 को हिन्दी दैनिक ‘आज’ में तोलोङ सिकि के संबंध में विस्तृत लेख छपा

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ज्ञातब्य है कि झारखण्ड अलग प्रांत आन्दोलन के छात्र नेताओं एवं बुदि्धजीवियों की राय थी कि आदिवासी भाषाओं की पहचान के लिए एक नई लिपि का विकास हो, पर यह कैसे हो या कौन करे, इस विषय पर सभी मौन रहे। इसी बीच पेशे से चिकित्सीक डॉ० नारायण उराँव द्वारा इस दिशा में कार्य किया जाने लगा। जिसे आन्दोंलनकारी छात्र नेताओं का प्रोत्सादहन मिला। 
इसी क्रम में रांची से छपने वाली हिन्दीत दैनिक ‘आज’ के पत्रकार श्री गिरजा शंकर ओझा के माध्यिम से इस नई लिपि के बारे में एक विस्तृित लेख सर्वप्रथम दिनांक 07 अक्टूनबर 1993 को प्रकाशित हुआ। समाचार में छपा – रांची स्थित ‘ट्राईबल रिसर्च एनालिसिस कम्यूेनिकेशन एण्डक एजूकेशन’ नामक संस्थाप ने बिहार‚ बंगाल‚ मध्यसप्रदेश आदि राज्योंि के सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करने वाले उरांव आदिवासियों की कुंड़ुख़ भाषा की लिपि का आविष्कासर कर लिया गया है। इस संस्था के अवैतनिक निदेशक पेशे से चिकित्स क डॉ० नारायण उरांव हैं तथा इसके सम्मा नित अध्यनक्ष पेशे से इंजिनियर श्री ए० एम० खलखो हैं। साथ ही लिपि के सर्जक डॉ० नारायण उरांव के साथ भेंटवार्ता की विस्तृत रिपोर्ट भी इसमें छपीं। 
रिपोर्टर –
भुनेश्वर उराँव
सहायक शिक्षक,
जतरा टाना भगत विद्या मंदिर,
बिशुनपुर, घाघरा, गुमला।

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