कुड़ुख (Kurukh) भाषा: भौगोलिक विस्तार, जनसांख्यिकीय गणना और भाषाई विद्वानों के दृष्टिकोण

कुड़ुख (जिसे ‘कुड़ुख’ या ‘उरांव भाषा’ भी कहा जाता है) भारत की सबसे समृद्ध और ऐतिहासिक जनजातीय भाषाओं में से एक है। यह मुख्यतः उरांव आदिवासी समुदाय द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। भौगोलिक रूप से दक्षिण भारत से सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तर और पूर्व भारत में स्थित होने के बावजूद यह भाषा द्रविड़ भाषा-परिवार (Dravidian Language Family) का हिस्सा है—जो इसे भाषाविज्ञानियों के लिए एक अत्यंत रोचक विषय बनाती है।

1. कुड़ुख भाषा का भौगोलिक विस्तार (इलाके, राज्य और देश)

कुड़ुख भाषियों का मुख्य केंद्र भारत का छोटानागपुर पठार क्षेत्र है, लेकिन ऐतिहासिक प्रवासन (जैसे चाय बागानों में काम करने जाना) के कारण यह भाषा भारत के कई राज्यों और पड़ोसी देशों तक फैली हुई है।

भारत में प्रमुख राज्य:

  • झारखंड: यह कुड़ुख भाषा का मुख्य गढ़ है। विशेषकर रांची, गुमला, लोहरदगा, लातेहार, सिमडेगा, खूंटी और गढ़वा जिलों में उरांव समुदाय की घनी आबादी है।
  • छत्तीसगढ़: सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर, रायगढ़ और कोरबा जिलों में कुड़ुख बहुलता से बोली जाती है।
  • ओडिशा: सुंदरगढ़, संबलपुर और झारसुगुड़ा जैसे पश्चिमी एवं उत्तरी जिलों में।
  • पश्चिम बंगाल: जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, अलीपुरद्वार और मालदा जिलों में (विशेष रूप से चाय बागानों में काम करने वाले उरांव समुदाय के बीच)। नोट: पश्चिम बंगाल सरकार ने फरवरी 2018 में कुड़ुख को राज्य में आधिकारिक भाषा का दर्जा प्रदान किया था।
  • बिहार एवं मध्य प्रदेश: बिहार के पूर्णिया, कटिहार और चंपारण तथा मध्य प्रदेश के पूर्वी सीमावर्ती इलाकों में।
  • असम और त्रिपुरा: पूर्वोत्तर के चाय बागानों में प्रवासी उरांव श्रमिक बड़े पैमाने पर बस गए हैं, जहाँ वे कुड़ुख और सादरी (Sadri) दोनों का प्रयोग करते हैं।

अन्य देशों में विस्तार:

  • नेपाल: नेपाल के तराई क्षेत्रों (झापा, मोरंग और सुनसरी जिलों) में उरांव समुदाय के लोग रहते हैं, जिन्हें वहाँ धांगड़‘ (Dhangar) भी कहा जाता है और वे नेपाल-कुड़ुख बोली का प्रयोग करते हैं।
  • बांग्लादेश: उत्तरी बांग्लादेश (राजशाही और रंगपुर संभाग) के चाय बागानों और ग्रामीण इलाकों में।
  • भूटान: दक्षिणी भूटान के चाय बागान क्षेत्रों में भी कुड़ुख भाषियों की छोटी आबादी पाई जाती है।

2. भाषाई गणना और वक्ताओं की संख्या

भारत की आधिकारिक जनगणना और अंतरराष्ट्रीय भाषाई अभिलेखागारों के अनुसार कुड़ुख वक्ताओं के आंकड़े निम्नलिखित हैं:

श्रेणी / स्रोतआंकड़े / विवरण
जनगणना (2011 Census of India)भारत में कुड़ुख/उरांव बोलने वालों की संख्या लगभग 20 लाख (2.0 Million) दर्ज की गई है।
वैश्विक जनसंख्या (Ethnologue / ELP)भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान मिलाकर कुल वक्ताओं की संख्या लगभग 20 से 25 लाख के बीच आंकी गई है।
जातीय जनसंख्या vs भाषाई वक्ताउरांव जनजातीय समुदाय की कुल आबादी लगभग 40 लाख के आसपास है। हालांकि, भाषाई विस्थापन (Linguistic Shift) के कारण कई युवा और शहरी आबादी अब सादरी, हिंदी या ओडिया जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाने लगी है, जिससे वास्तविक कुड़ुख भाषियों की संख्या कुल जातीय आबादी से कम है।

3. भाषाविदों एवं विद्वानों के मत (Scholarly Views)

कुड़ुख भाषा की उत्पत्ति, इसके वर्गीकरण और व्याकरणिक विशेषताओं पर भारतीय और यूरोपीय भाषाविदों ने गहन शोध किया है:

(क) द्रविड़ भाषा-परिवार में वर्गीकरण

  • डॉ. रॉबर्ट काल्डवेल (Robert Caldwell): द्रविड़ भाषा-विज्ञान के जनक माने जाने वाले काल्डवेल ने अपने तुलनात्मक व्याकरण में यह स्पष्ट किया कि छोटानागपुर की उरांव भाषा द्रविड़ परिवार से संबंध रखती है।
  • उत्तरी द्रविड़ उप-समूह (North Dravidian Subfamily):भाषाविदों (जैसे एम.बी. एमिनो और टी. बुरो) के अनुसार,कुड़ुख को द्रविड़ परिवार कीउत्तरी शाखामें रखा गया है।इस वर्ग में इसके सबसे नजदीकी संबंधी भाषाएँ हैं:
    1. माल्टो (Malto): झारखंड के साहिबगंज और राजमहल पहाड़ियों की सौरिया पहाड़िया जनजाति की भाषा।
    2. ब्राहुई (Brahui): पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में बोली जाने वाली द्रविड़ भाषा।

विद्वानों का ऐतिहासिक मत: विशाल आर्य-भाषाई (Indo-Aryan) क्षेत्र के बीचों-बीच उत्तर भारत में कुड़ुख और माल्टो का अस्तित्व भाषाविदों के लिए एक बड़ा प्रमाण है कि सुदूर अतीत में द्रविड़ भाषा-परिवार का विस्तार पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में था।

(ख) प्रवासन सिद्धांत (Migration Theory)

  • रोमन कैथोलिक मिशनरियों व नृवंशशास्त्रियों (जैसे सर शरत चंद्र रॉय – S.C. Roy) का मत: एस.सी. रॉय ने अपनी पुस्तक “The Oraons of Chota Nagpur” में लिखा कि कुड़ुख भाषी मूलतः दक्षिण भारत (संभवतः कोंकण या नर्मदा घाटी क्षेत्र) से उत्तर की ओर बढ़े थे। वे शाहबाद (रोहतासगढ़) होते हुए छोटानागपुर के पठार पर बसे। इसी कारण इनकी भाषा में तमिल और कन्नड़ जैसी दक्षिण भारतीय भाषाओं से व्याकरणिक और शब्दकोशीय समानताएँ मिलती हैं।

(ग) लिपि और साहित्य (Tolong Siki & Script)

  • डॉ. नारायण उरांव (Dr. Narayan Oraon): कुड़ुख भाषा मुख्यतः मौखिक परंपरा में समृद्ध रही और देवनागरी में लिखी जाती थी। 1999 में डॉ. नारायण उरांव ने कुड़ुख भाषा के लिए एक स्वतंत्र लिपि तोलोंग सिकि‘ (Tolong Siki) का आविष्कार किया, जिसे अब झारखंड सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • यूनेस्को (UNESCO) का दृष्टिकोण: यूनेस्को ने कुड़ुख को संवेदनशील/असुरक्षित‘ (Vulnerable) भाषा की सूची में रखा है। विद्वानों का मानना है कि यदि प्राथमिक शिक्षा में कुड़ुख का प्रयोग और साहित्यिक संरक्षण नहीं बढ़ाया गया, तो क्षेत्रीय संपर्क भाषाओं (जैसे सादरी और हिंदी) के प्रभाव से इस प्राचीन भाषा के अस्तित्व पर खतरा मंडराता रहेगा।

तोलोंग सिकि (Tolong Siki) को यूनिकोड कंसोर्टियम (Unicode Consortium) द्वारा आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है। इसे यूनिकोड स्टैंडर्ड के संस्करण 17.0 के तहत आधिकारिक कोड ब्लॉक (U+11DB0 से U+11DEF) आवंटित किया गया है।

डिजिटल दुनिया और भाषा-संरक्षण के दृष्टिकोण से यह कुड़ुख भाषियों और पूरी आदिवासी संस्कृति के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

पाठकों और कुड़ुख भाषियों के लिए महत्वपूर्ण एवं उत्साहवर्धक जानकारी

तोलोंग सिकि का यूनिकोड में शामिल होना केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह कुड़ुख भाषा के भविष्य के लिए नए दरवाजे खोलता है:

1. डिजिटल और सोशल मीडिया पर सीधी उपलब्धता

  • स्मार्टफोन और कंप्यूटर पर टाइपिंग: यूनिकोड मान्यता मिलने के बाद अब मोबाइल फोन, लैपटॉप और कंप्यूटरों में तोलोंग सिकि लिपि के फॉन्ट और कीबोर्ड लेआउट (Keyboard Layouts) इनबिल्ट उपलब्ध हो रहे हैं।
  • व्हाट्सएप और सोशल मीडिया: पाठक अब व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (Twitter) जैसी जगहों पर देवनागरी के बजाय सीधे अपनी मूल तोलोंग सिकि लिपि में संदेश भेज और लिख सकते हैं।

2. गूगल सर्च और डिजिटल आर्काइविंग

  • अब तक जो भाषा केवल कागजों या विशेष पीडीएफ फॉन्ट तक सीमित थी, वह अब इंटरनेट की मुख्यधारा का हिस्सा बन चुकी है।
  • गूगल (Google) और अन्य सर्च इंजन अब तोलोंग सिकि में लिखे कंटेंट को रीड और इंडेक्स (Index) कर सकते हैं। इससे कुड़ुख भाषा का साहित्य, लोककथाएं और इतिहास हमेशा के लिए डिजिटल दुनिया में सुरक्षित (Digital Archiving) हो गए हैं।

3. एआई (AI) और मशीन ट्रांसलेशन में प्रवेश

  • यूनिकोड में शामिल होने के कारण आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मॉडल, गूगल ट्रांसलेट और चैटबॉट भी तोलोंग सिकि का समर्थन करने लगेंगे।
  • इसका मतलब है कि भविष्य में कुड़ुख भाषा से हिंदी, अंग्रेजी या अन्य वैश्विक भाषाओं में सीधे मशीन अनुवाद (Machine Translation) संभव हो सकेगा।

4. आधिकारिक और शैक्षणिक मान्यता को मजबूती

  • सरकारी गजट: झारखंड सरकार ने 2007 में ही इस लिपि को मान्यता दी थी। यूनिकोड मिलने के बाद अब सरकारी दस्तावेजों, प्राथमिक विद्यालयों के पाठ्यक्रमों और विश्वविद्यालय स्तरीय पठन-पाठन में तोलोंग सिकि के डिजिटल उपयोग में कोई तकनीकी बाधा नहीं रहेगी।
  • पुस्तकों का डिजिटल प्रकाशन: कुड़ुख साहित्यकार और युवा अब अपनी किताबें ई-बुक (e-Books) के रूप में पूरी दुनिया में प्रकाशित और शेयर कर सकते हैं।

डॉ. नारायण उरांव के सपने को मिला वैश्विक मंच

डॉ. नारायण उरांव द्वारा 1999 में विकसित की गई तोलोंग सिकि लिपि ने मात्र ढाई दशकों में वैश्विक स्तर पर जगह बनाई है।

नारायण उरावं

संदेश: कुड़ुख भाषी युवाओं को अब अपनी भाषा के लुप्त होने या पीछे छूटने की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। आपकी भाषा और लिपि अब आधुनिक तकनीक के हर पैमाने पर खरी उतर चुकी है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि नई पीढ़ी अपनी दैनिक डिजिटल बातचीत में तोलोंग सिकि का अधिक से अधिक प्रयोग करे।

एक नज़र तोलोंग सिकि के ‘डिजिटल’ वास्तुकारों पर

तोलोंग सिकि को आधुनिक और मानक रूप में डिजिटल दुनिया तक पहुँचाने का श्रेय वरिष्ठ पत्रकार और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के विशेषज्ञ श्री किसलय (Mr Kislaya) को जाता है। डॉ नारायण उरांव और उनकी टीम के विशेष अनुरोध पर, श्री किसलय ने मेहनत और समर्पण के साथ इस लिपि का पहला डिजिटल फोंट तैयार किया, जिसे Kelly Tolong नाम दिया गया। यह फोंट आज भी तोलोंग सिकि के मानक डिजिटल स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है और इसी की बुनियाद पर आज पूरी दुनिया में यूनिकोड कंसोर्टियम ने इस लिपि को स्वीकार किया है। श्री किसलय का यह तकनीकी योगदान इस ऐतिहासिक उपलब्धि में एक अमूल्य स्तंभ है।

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