सिलागामी (सिलागांई) धरती का लाल क्रांतिकारी क्यों बना?

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बीर बुधू भगत, बचपन से ही गरीबी, भ्ाुखमरी के साथ जमींदार, साहुकार, महाजन, बनिया अर्थात् गैर आदिवासियों की बर्बरता को देखे। वे देखे कि किस प्रकार तैयार फसल को जमींदार उठा ले जाते थे, और गरीब गाँव वालों के घर कर्इ-कर्इ दिनों तक चुल्हा नहीं जल पाता, गाँव के बच्चे, बुढ़े सभी भ्ाूख से बिलखते रहते। माँ बहनों का खुन सूखता था, लेकिन इन सभी मार्मिक दृश्यों से जमींदारों का मन तनिक भी नहीं पसीजता था। वे किसानों से कर (मालगुजारी) के रूप में बड़ी रकम वसूल कर ले जाते थे। उन लोगों का विरोध करने का हिम्मत कोर्इ नहीं कर पा रहा था। उलटे सूदखोरों, महाजनों एवं जमींदारों को ब्रिटिश हुकूमत का साथ मिल रहा था। ब्रिटिश सरकार, जमींदारों को हुकूम दे रखा कि वे ग्रामीणों से अधिक से अधिक मालगुजारी और लगान वसूल करे लेकिन गरीब लोग लगान कहाँ से चुका पाते, लगान न चुकाने की स्थिति में जमींदार के आदमी ग्रामीणों पर तरह-तरह के दृाोशण और अत्याचार करते थे। उनके मवेशियों को जबरन खोलकर ले जाते, अनाज छीन लेते तथा खेतों को गिरबी रखवा लेते थे। बेगारी काम कराते, अप ाब्दों से गाली देते, मारते-पिटते, इतना तक की मृत्यु भी हो जाती थी। अधिकतर जमीन्दार अंगरेजी हुकुमत के पक्षधर थे। कुछ जमीन्दार अच्छे भी थे और जनता के साथ उनका रिस्ता सरल था। कहा जाता है रातु महाराजा के वंशज महाराजा दुर्जन साय, मुगल सम्राट की अधिनता स्वीकार नहीं किये और लगान देने से इनकार कर दिया। इसपर, उन्हें बन्दी बनाकर ग्वालियर जेल में रखा गया, जहाँ पहले से ही अलग-अलग क्षेत्र के कर्इ राजा-महाराजा कैदी बने हुए थे। वहाँ एक दिन मुगल सम्राट के सामने असली और नकली हीरा पहचानने की होड़ लगी। कहा जाता है महाराजा दुर्जन साय के पास हीरा पहचानने की एक अजीब सी चीज थी जिसे महारजा ‘हिरी’ कहते थे। उसके बारे में महाराजा दुर्जन साय को छोड़कर दूसरा कोर्इ नहीं जानता था। महाराजा की इस तरकीब को पाकर मुगल सम्राट बहुत खुश हुए और उन्हें मुक्त करने की घोशणा की तथा पूरा छोटानागपुर को स्वतंत्र कर दिया अर्थात मुगल शासनकाल में टैक्स देना नहीं पड़ता। साथ ही महाराजा के कहने पर सभी बन्दी राजाओं को भी मुक्त कर दिया गया।

कालांतर में 12 अगस्त 1765 में बंगाल, बिहार और ओड़िसा की दिवानी के साथ छोटानागपुर भी अंगरेजों को मिली। अंगरेजी राज्य कायम होने से अंगरेज अधिकारियों ने कचहरी की न्याय व्यवस्था बहाल हुर्इ, जिसमें बाहर के व्यापारी, लोभी-लालची और तरह-तरह के लोगों को आने एवं धोखाधड़ी कर लूट-खसोट करने को प्रोत्साहन मिला। इस व्यवस्था में भाशा की जानकारी का आभाव लोगों को लाचार बना दिया। अंगरेज मजिस्टे्रट अंगरेजी में सुनते और समझते थे। दुभाशिया और गवाह बनियाँ और महाजन बन गये थे, जो आदिवासियों को झूठा मुकदमा में फँसाकर जेल भेजवाते और उनकी जमीन लूट लेते थे। कहा जाता है – उस समय दृोरघाटी (गया, बिहार) जेल, आदिवासियों से भर गया और वहाँ कर्इ लोग जेल में ही मर गये। इधर अंगरेज अफसर महाराजा के लोगों से दृाासन करते थे और महाराजा अपनी सारी जिम्मेदारी अपने अमला-प्यादा पर छोड़ दिये थे। इससे लोग हर तरह से आदिवासियों को लूटा और लाभ उठाया। महाराजा के अमला-प्यादा लगान पाने के बाद भी रसीद नहीं देते थे। तलबाना के नाम से रूपया वसूल करते और दाहरा में बकरी और काड़ा वसूल करते थे। अंगरेजों द्वारा ऐसे जुल्म को रोका जा सकता था, परन्तु उन्होंने इसे नहीं रोका। लोहरदगा और बुण्डु में जो मुन्सिफ कोर्ट खुला, वहाँ गैर आदिवासियों ने आदिवासियों को लूटा और जमीन्दरों ने उनका साथ दिया। वहाँ बराबर बनावटी गवाह रहते थे जो यह साबित करते थे कि उनका (आदिवासी), जमीन-जायजाद पर कोर्इ मालिकाना हक नहीं है। जो हक मांगते उन्हें देशद्रोही ठहरा दिया जाता था। दूसरी ओर, बाहर से आये बनियाँ, महाजन और ठेकेदार आदिवासी महिलाओं तथा लड़कियों के साथ अत्याचार करने लगे। अगर कोर्इ उनके खिलाफ सिर उठाता तो जमीन्दारों की टोली गलत आरोप में फँसा देती थी। कहा जाता है बन्दगाँव (कोलहान क्षेत्र) का बिन्दराय मानकी की पत्नी को वहाँ का एक ठेकेदार भगाकर ले गया और उनकी दो बहनों के साथ बलातकार किया। इससे पूरा कोल्हान आन्दोलित हो गया और उस ठेकेदार को जान से मार दिया। उसके बाद सिंगराय और बिन्दराय दोनों भार्इ पर शेरघाटी कोर्ट में मुकदमा हुआ। इसी तरह तमाड़ राजा बैजनाथ मानकी की मृत्यु के बाद वहाँ का नाजीर धोखा देकर उसके बेटे को गिरफतार करवा दिया और शेरघाटी जेल भेजवा दिया। इससे पूरा पंचपरगना क्षेत्र आन्दोलित हो उठा। अंगरेज सरकार ने आदिवासियों के बीच हँड़िया टैक्स लागू कर दिया और पॉपी (ऑपियम) की खेती के लिए बाध्य करना दृाुरू किया। इससे पूरे क्षेत्र में विरोध होने लगा। पलामु में भोक्ता समाज ने छिटफुट, कर्इ बार आन्दोलन किया। इसी तरह झिको चट्टी, कुड़ू, चंदवा आदि कर्इ स्थानों पर इतना अत्याचार हुआ कि लोग आन्दोलित हो उठे। इधर बुधूबीर, लोगों को जुटा रहे थे और छापामार लड़ार्इ की तैयारी कर रहे थे। बुधूबीर की गोरिला तकनीक ऐसी थी कि लोग भ्रम में पड़ जाते थे और कहते थे कि वे गायब हो जाते हैं। इस तरह पूरे छोटानागपुर में असंतोश की लहर थी। लोग अंगरेजों शासन से मुक्ति चाहते थे।

– सुश्री कमला लकड़ा, शोधार्थी, टी.आर.एल, राँची विश्‍वविद्यालय, राँची।

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