KurukhTimes Magazine Vol 15 Published

संस्कृत, हिन्दी एवं कुँडुख़ भाषा की ध्वनियाँ (एक तुलनात्मक अध्ययन) : यद्यपि संस्कृत, हिन्दी एवं कुँडुख़ भाषा की ध्वनियों का तुलनात्मक अध्ययन एक जटिल विषय है
तथापि इन भाषाओं में उच्चरित ध्वनियों एवं इन ध्वनियों को लिखने के तरीकों को वर्तमान तकनीक के आधार पर इसके गुण-दोषों को इस शीर्षक के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास है।
A. संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि :-

संस्कृत में स्वर के तीन भेद हैं-
(क) हृस्व स्वर – अ, इ, उ, ऋ, लृ। (सामान्य उच्चारण समय)
(ख) दीर्घ स्वर – आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ औ। (हृस्व से दोगुना उच्चारण समय)। ए, ऐ, ओ, औ
को संयुक्त स्वर भी कहा जाता है। (कुडुख़ में दीर्घ को दुगुहा अर्थात दोगुना उच्चारण समय वाला समझना है।)
(ग) प्लूत स्वर -अ३, इ३, उ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३, ऋ३, लृ३। (हृस्व से तीन गुना उच्चारण समय)।

  1. वैदिक उच्चारण में इन सभी स्वरों का उदात, अनुदात एवं स्वरित तीन रूप तथा इन तीनों का अनुनासिक रूप भी होता
    है। इस प्रकार हृस्व स्वर – 5x 6=30, दीर्घ स्वर-8 x 6=48 तथा प्लूत स्वर -9×6=54। कुल स्वर ध्वनियाँ 30
    +48+54=132 (एक सौ बत्तीस)। वर्तमान पठन-पाठन कार्य में वैदिक स्वर का स्वरित रूप का उपयोग होता है। उदात
    और अनुदात रूप वैदिक मंत्रोचारण तक सीमित है। संस्कृत उच्चरण में निम्नलिखित व्यंजन वर्ण है-क्, ख्, ग्, घ्, ङ्, च्,
    छ् ज, झ, ञ, ट्, ठ्, ड्, ढ, ण, त् थ् द् ध् न् प् फ् ब् भ् म् य् र् ल् व् श स् ष् हक्ष त्र ज्ञ श्र्। इसके अलावे कई संयुक्ताक्षर
    भी है, जो साहित्यिक रूप से महत्वपूर्ण है।
    पूरा आलेख नीचे पीडीएफ में पढ़ें..

Comments

Leave a Reply