Dr Narayan Oraon
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कुँडुख भाषा की लिपि : तोलोंग सिकि

कुँडुख भाषा की लिपि : तोलोंग सिकि तोलोंग सिकि एक लिपि है। यह लिपि, भारतीय आदिवासी आंदोलन तथा झारखण्ड का छात्र आंदोलन की देन है। इस लिपि को आदिवासी कुंडुख (उराँव) समाज ने अपनी भाषा की लिपि के रूप में स्वीकार किया और पठन-पाठन में शामिल कर लिया है। इस लिपि के प्रारूपण में मध्य
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आदिवासी परम्परा एवं प्रकृति विज्ञान

प्रस्तुत शीर्षक ‘‘आदिवासी परम्परा एवं प्रकृति विज्ञान’’ के द्वारा भारत देश में निवासरत आदिवासी समाज एवं उनकी जीवन गाथा में प्र.ति और उनका प्रेम को आप पाठकों तक बतलाने का यह मामूली सा प्रयास है। वैसे भारतीय संविधान में ‘‘आदिवासी’’ शब्द की परिभाशा स्पष्ट नहीं है फिर भी भारतीय मानस पटल पर यह शब्द प्रचलित एवं
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कुँड़ुख़ (उराँव) परम्परा में अध्यात्मिक मान्यताएँ
साधरणतया, लोग कहा करते हैं – आदिवासियों का कोर्इ धर्म नहीं है। इनका कोर्इ आध्यात्मिक चिंतन नहीं है। इनका विश्वास एवं धर्म अपरिभाशित है। ये पेड़-पोधों की पूजा करते हैं …. आदि, आदि। इस तरह के प्रश्नों एवं शंकाओं को प्रोत्साहित करने वालों से अगर पूछा जाय – क्या, वे अपने विश्वास, धर्म आदि
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ख़द्दी परब (सरहुल त्योहार)

नमहँय देश भारत नू अकय बग्गे भख़ा कछनखरऊ अरा नने किसिम गहि संस्कृति खोड़हा नू मेसेरका रअ़र्इ। हुल्लो परिया तिम इसन नने रकम जइतर तंगआ-तंगआ भख़ा-संस्कृति, परम्परा अरा विश्वासन अङिय’अर संग्गे-संग्गे रअ़ते बरआ लगनर। र्इवन्दा बेड़ा नू अकय किय्या-मर्इय्या मंज्जा। एका-एका जइतर गहि भख़ा-संस्कृति, इतिङख़ीरी गहि कगद नूम रर्इह केरा, पहें एका-एका खोड़हा गहि आ:लर,
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करम परब गही ख़ीरी (करम त्योहार की कहानी)

बअ़नर – हुल्लो परिया नु ओरोत कुँड़ुख़ बे:लस ही रा:जी नु ओंगओल अनभनियाँ रा:जी कीड़ा मंज्जा। चेंप-झड़ी मल पुर्इंका ती खितीपुती मल मना लगिया। तूसा-झरिया, खाड़-ख़ोसरा, कूबी-पोखारी उरमी ख़ाया लगिया। मन्न-मास ही खं़जपा हूँ नठारआ हेल्लरा। ओना-मोख़ा गे मल ख़खरना ती टोड़ंग-परता ता अड़ख़ा-चे:खे़ल अरा बोकला गुट्ठीन मो:ख़र, आलर एकअम बेसे उल्ला खेपआ लगियर। चान-चान,
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गुरूभक्त एकलव्य और गुरू द्रोणाचार्य

(माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ द्वारा माह जनवरी 2011 में दिये गए एक अभूतपूर्व फैसले के पश्चा1त् महान आदिवासी जननायक, गुरूभक्त एकलव्य के स्मृति में गुरूभक्त एकलव्य जयंती सप्ताह के अवसर पर समर्पित) : एक कहावत है – ‘‘ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं।’’ यह कहावत ‘‘एकलव्य’’
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बीजिरपो (श्राद्ध हेतु एकत्र किया गया धन)

समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में समय-समय पर खबर छपती है – एक परिवार, पैसे की कमी के चलते अपने कांधे पर ढोकर अपने परिजन का अंतिम संस्कार को ले गया अथवा एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार के लिए कोर्इ मद्दगार नहीं मिला तो बच्चे और महिलाएँ, पड़ोस के एक ठेले में लेकर गये आदि, आदि।
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कुँड़ख़र ही कुड़ा-मो:ख़ा सिखिरना अरा सिखाबअ़ना

बअ़नर – हुल्लो परिया नु नमहय पुरखर टोड़ंग-परता अरा नाल-झरिया अबड़ा गने रअ़नुम नमन बछाबा:चर। आ बेड़ा नु कन्दा-ख़ंजपा गुट्ठिन बेगर बी:तकम मो:ख़ा लगियर। अहड़न हूँ ख़े:नम मो:ख़ा लगियर। कूल गे की:ड़ा लग्गो दिम अरा जिया गे अम्म ओनका लग्गो दिम। अवंगे कूल-की:ड़ा अरा अम्म ओनकन मेटाबआ गे टोड़ंग परता ता ख़ंजपन मो:ख़र दरा झरिया
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फग्गु परब ही ख़ीरी/धुमकुड़िया ही मुंधता ख़ीरी (फग्गु पर्व तथा धुमकुड़िया के आरंभ की कुँड़ुख़ लोक-कथा)
बअ्नर हुल्लो परिया नु कुँडु.ख़ खोंड़हा अकय ससर्इत नु रहचा। ओण्टा सोनो गिधि (ॅीपजम अनसजनतम) आल जियन केरमे-केरमे पिटा-मुंज्जा लगिया। आद आ:लर गही उगता-पगसिन ओन्टे कोहाँ ले सरा-हरा सिम्बाली मन्न नु खोता कमआ लगिया अरा आ:लारिन नेप्पा-नेप्पा खोता मइय्याँ पिटा-मोख़ा लगिया। एका-एका से उल्ला कट्टा लगिया अन्नेम नितकिम ओरोत आल जिया खोंडहा ती नठारआ लगियर।
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कुँड़ख़र अरा सोहराई परब

हुल्लो परिया ता कत्था तली। टोड़ंग-परता मजही नू ओण्टे पद्दा रहचा। आ पद्दा ता उरमी आलर-तेःलर‚ अड्डो-मेक्खो‚ ओःड़ा-ख़ोःख़ा– जिया-जउँत दव कुना उज्जा-बिज्जा लगिया। बअ़नर – आल जिया उरमी उल्ला ओण्टे बेसेम मल रअ़ई। एका तरती एन्देर ताःका बरचा का अन्ति धरमे ही छया-भया। आ बेड़ा अनभनियाँ राःजी कीःड़ा मंज्जा। चेंप-झड़ी मल मंज्जका ती केरमे-केरमे आःलो
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- Kurukh Times की डिजिटल पत्रिका अंक 16 प्रकाशित हुआपूर्व के अंकों की तरह पत्रिका का 16वां अंक प्रकाशित हो गया है। इसमें तोलोंग सिकि लिपि में रोचक सामग्री शामिल किये गय हैं। आशा है अन्य अंकों की तरह इस अंक को भी आपका भरपूर प्यार मिलेगा। इसे आप इस पन्ने पर देख सकते हैं। आप चाहें तो इसे अपने पीसी या मोबाइल में… Read more: Kurukh Times की डिजिटल पत्रिका अंक 16 प्रकाशित हुआ