रांची (9 अगस्त, 2026): आज पूरे देश और दुनिया में ‘विश्व आदिवासी दिवस’ (International Day of the World’s Indigenous Peoples) पारंपरिक उत्साह और गौरव के साथ मनाया जा रहा है। मूल निवासियों के अधिकारों, उनकी समृद्ध संस्कृति और जल, जंगल, जमीन के संरक्षण में उनके योगदान को याद करने का यह एक ऐतिहासिक अवसर है।
इतिहास और पृष्ठभूमि
इस खास दिन की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) द्वारा की गई थी। 9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र के कार्यदल (Working Group on Indigenous Populations) की पहली बैठक हुई थी। इसके बाद, साल 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आधिकारिक तौर पर हर साल 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की। तब से लेकर आज तक, यह दिन आदिवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा और उनकी अनूठी पहचान को अक्षुण्ण रखने के संकल्प के रूप में मनाया जाता है।
भारत और झारखंड में विशेष महत्व
भारत में आदिवासी समुदाय (अनुसूचित जनजाति) की आबादी देश के विकास और विविधता की रीढ़ है। खासकर झारखंड राज्य के लिए यह दिन किसी महापर्व से कम नहीं है। ‘झाड़’ (झाड़ियों/जंगलों) और ‘खंड’ (भूमि) से मिलकर बने झारखंड का इतिहास ही आदिवासी संघर्ष, अस्मिता और प्रकृति प्रेम से जुड़ा हुआ है।
- क्रांतिकारियों की भूमि: भगवान बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और तिलका मांझी जैसे महान आदिवासी जननायकों ने इसी धरती से जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए उलगुलान (विद्रोह) का शंखनाद किया था।
- सांस्कृतिक धरोहर: आज के दिन झारखंड की राजधानी रांची सहित दुमका, जमशेदपुर और खूंटी जैसे विभिन्न जिलों में मांदर और नगाड़ों की गूंज के साथ पारंपरिक नृत्य-संगीत (जैसे करम और सरहुल की झलकियां) देखने को मिल रहे हैं।
- प्रकृति से जुड़ाव: झारखंड का समाज सदियों से पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। यह दिन आधुनिक दुनिया को यह याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर कैसे जिया जाता है।
आज इस अवसर पर झारखंड सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा कई सांस्कृतिक व जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जहां आदिवासी समाज की कला, शिल्प, भाषा और अधिकारों के संरक्षण का संकल्प दोहराया जा रहा है।

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