प्रकृति की थाली: आदिवासी खान-पान की सेहतमंद और स्वादिष्ट परंपरा

बढ़ती आबादी और समय के साथ रहन-सहन, संस्कारों तथा खान-पान में आये बदलावों के बावजूद आदिवासी समाज ने अपनी जीवनशैली को प्रकृति के साथ संतुलित रखने की परंपरा को हमेशा संजोकर रखा है। प्रकृति के अनुरूप ढली इस जीवनशैली में उनके भोजन का विशेष स्थान है।

आदिवासी खान-पान केवल पेट भरने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, स्वाद और पोषण का अद्भुत संगम भी है। उनके पारंपरिक व्यंजनों में ऐसे प्राकृतिक खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं जो शरीर को स्वस्थ, सशक्त और ऊर्जावान बनाए रखते हैं। यही कारण है कि इन व्यंजनों में पोषक तत्वों की प्रचुरता होती है और स्वाद के मामले में भी इनकी अपनी अलग पहचान है।

आज हम इसी विषय को आपके सामने लेकर आये हैं—आदिवासी खान-पान की समृद्ध परंपरा और उसमें छिपे पौष्टिक तत्वों का एक अनमोल पिटारा। इस विषय को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया है डॉ. बैजयंती उरांव ने।

डॉ. बैजयंती उरांव एक शिक्षिका हैं और उन्होंने होम साइंस विषय में पीएचडी की है। अपने शोध के माध्यम से उन्होंने आदिवासी भोजन परंपरा, उसके पोषण मूल्य और उसके वैज्ञानिक पहलुओं को विस्तार से समझने का प्रयास किया है।

उनके इसी महत्वपूर्ण शोध कार्य को आप नीचे दी गई पीडीएफ में पढ़ सकते हैं तथा चाहें तो डाउनलोड भी कर सकते हैं।

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