रूढ़ी-प्रथा के अन्तर्गत ग्रामसभा एवं पड़हा के कार्यकारिणी सदस्य – कौन और कैसे ?

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ज्ञात हो कि रूढ़ीप्रथा ग्रामसभा पड़हा बिसुसेन्दरा, सिसई-भरनो, गुमला (झारखण्ड) द्वारा विगत 13 वर्षों से रूढ़ीप्रथा में प्रचलित सामाजिक मान्‍यताओं  को लिखित रूप में संकलित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अग्रेतर  क्रियान्वयन में परम्परागत ग्रामसभा पड़हा बिसुसेन्दरा 2020 के लिखित प्रतिवेदन के कंडिका –  9, 10, 11 को सामाजिक आधार मानकर   डॉ0 रामदयाल मुण्डा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची (झारखण्ड) की विशेष कमिटि द्वारा प्रथागत आदिवासी समाज में विवाह विच्छेद (तलाक) विषयक मन्तव्य वर्ष 2021 में माननीय हाईकोर्ट, रांची को समर्पित किया गया है।

ध्यातव्य हो कि रूढ़ीप्रथा ग्रामसभा पड़हा बिसुसेन्दरा, सिसई-भरनो द्वारा लगातार इन विषयों पर अभिलेखीकरण किया जा रहा है तथा कानून के जानकारों के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है। इसी बीच वर्ष 2023 से झारखण्ड सरकार द्वारा पेसा कानून की बातें भी जो-शोर से आ रही है। इसके आलोक में समाज की अपनी तैयारी के बारे बिसुसेन्दरा सिसई-भरनो संयोजन समिति की अनुमति से यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि भारत देश के अलग-अलग राज्यों में निवासरत प्रथागत उरांव आदिवासी समाज में रूढ़ीजन्य ग्रामसभा एवं पड़हा की वस्तु स्थिति के बारे में जानकारी संकलित कर बिसुसेन्दरा सिसई-भरनो, संयोजन समिति को समर्पित किया जाए। 

इसी कड़ी में विगत 9-11 मई 2025 को सम्पन्न रूढ़ीप्रथा ग्रामसभा पड़हा बिसुसेन्दरा, सिसई-भरनो की संयोजन समिति की अनुमति से मैं बिरसा उरांव ग्राम भुरसो, थाना सिसई, जिला गुमला निवासी अपने तीन वरीय साथियों के साथ इस जिम्मेदारी मुहिम का शुभारंभ किये। इस मुहिम में दिनांक 29.मई 2025 को राजी पड़हा, भारत के राजी बेल श्री बागी लकड़ा (एडवोकेट) से मिलने उनके निवास स्थान जगदा, राउरकेला पहूंचे। हमारे टीम में वरीय सदस्य डॉ0 नारायण उरांव ‘‘सैन्दा’’, कुहाबेल श्री जुब्बी उरांव एवं सदस्य श्री विजय उरांव थे। हम सभी, राजी पड़हा, भारत के राजी बेल श्री बागी लकड़ा से रूढ़ीप्रथा ग्रामसभा पड़हा बिसुसेन्दरा से संबंधित लगातार 2 घंटे तक बातचीत किए। हमारी टीम का प्रश्न था कि – क्या आलोग रूढ़ी-प्रथागत ग्रामसभा को मानते हैं ? इसपर उनका उत्तर मिला हां मानते हैं। हमारी टीम का दूसरी प्रश्न था – क्या, आपलोग रूढ़ी-प्रथागत पड़हा को मानते हैं? इसपर उनका उत्तर मिला हां मानते हैं। हमारी टीम का तीसरा प्रश्न था – आपलोगों के पास ग्रमसभा एवं पड़हा के देखरेख के लिए ढांचागत व्यवस्था क्या है? इसपर माननीय पड़हा बेल ने कहा कि – गांव में पढे-लिखे लोग कम हैं या नहीं हैं, वैसी स्थिति में लोग इन चीजों को ठीक से नहीं समझ पाते हैं। इसलिए हमलोगों ने ग्रामसभा के पदधारी के रूप में चयनित कर दिया है। इसी तरह पड़हा स्तर पर लोग चयनित हैं। ढांचागत स्वरूप – अतख़ा पड़हा, डाड़ा पड़हा, मूली पड़हा, पादा पड़हा एवं राजी पड़हा है। इसमें सभी स्तर पर बेल, दिवान, कोटवार इत्यादि पदधारी हैं। 

इसी तरह दिनांक 14.05.2025 दिन शनिवार को टाना भगत अतिथ्रिगृह, बनहोरा रांची में रूढ़ीप्रथा ग्रामसभा, पड़हा विषयक परिचर्चा हुई। इस परिचर्चा मे मुख्य रूप से राजी पड़हा भारत के छतीसगढ़ राज्य, पड़हा समन्वय समिति, झारखण्ड रांची एवं बुनियादी पड़हा के कार्यकर्ता शामिल थे। इस परिचर्चा में शामिल – टीम धुमकुड़िया के संयोजक डॉ0 विनीत कुमार भगत द्वारा बैठक की गवाही देते हुए बतलाया गया कि इस परिचर्चा में मुख्य रूप से तीन समूह के प्रतिनिधियों द्वारा परिचर्चा में अपनी बातें रखी गई। इनमें से राजी पड़हा वाले वक्ता राजी पड़हा बेल श्री बसंत भगत ने राजी पड़हा की संरचना पर चर्चा किये, जिसमें – अतख़ा पड़हा, डाड़ा पड़हा, मूली पड़हा, पादा पड़हा एवं राजी पड़हा बतलाया गया तथा यह भी बतलाया गया कि इसमें सभी स्तर पर बेल, दिवान, कोटवार इत्यादि पदधारी चुने जातें हैं। राजी पड़हा बेल श्री बसंत भगत द्वारा प्रश्न उठाया गया कि सभी लोग राजी पड़हा में जुड़ जाएं। अलग से कोई संगठन की आवश्यकता नहीं है। राजी पड़हा बेल के इस प्रश्न पर पड़हा समन्वय समिति के सदस्य सहमत नहीं हुए। इस विषय पर पड़हा समन्वय समिति के अध्यक्ष श्री राणा प्रताप उरांव ने कहा कि अभी के समय में इस तरह का एकीकरण संभव नहीं दिखता है। चूंकि ओड़िशा एवं छतीसगढ में राजी पड़हा का कार्य चल रहा है वे करते रहें, परन्तु झारखण्ड में बुनियादी पड़हा या रूढ़ी-प्रथागत व्यवस्था पर आधारित ग्रामसभा एवं पड़हा का संचालन किया जा रहा है, उसे चलने दिया जाए। बुनियादी पड़हा समूह के लोगों का मानना है कि भारत देश की आजादी के पहले से ही यह रूढ़ी-प्रथागत स्वशासन व्यवस्था चली आ रही है, जिसे ततकालीन राज्य सत्ता ने भी मान्यता दिया गया है। इसका उदाहरण एवं दस्तावेज, उस गांव का खेवट-खतियान है। इस परिचर्चा के अंत में यह बात बनी कि सभी अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करें और यदि कोई मुद्दा सामने आवे तो मिलकर मुकाबला किया जाए।
उपरोक्त विषयों पर बुनियादी पड़हा समूह वाले प्रतिनिधियों का मानना है कि देश की आजादी से पहले से चला आ रहा यह बुनियादी पड़हा व्यवस्था ही रूढ़ी पड़हा व्यवस्था है। इस संबंध में श्री भउवा उरांव ग्राम: मदई, श्री जुब्बी उरांव, ग्राम: लोंगा, श्री विनोद भगत, ग्राम: हिरही (तीनों पड़हा कार्यकर्ता) का मानना है कि गांव के संचालन के लिए पूर्वजों द्वारा – माहतो, पहान, पुजार, करठा, कोटवार इत्यादि पदवी स्थापित किया गया और उसके लिए गांव में पूजा खेत दिया गया। इसे तत्कालीन राज्य सत्ता भी मंजूरी दिया और उससे लगान नहीं लिया। रूढ़ीगत पड़हा व्यवस्था में – एक पड़हा, कई गांव समूह मिलकर बनता है। जैसे – 3 गांव, 5 गांव, 7 गांव, 9 गांव, 11 गांव, 21 गांव, 22 गांव इत्यादि। इनमें से एक गांव को बेल अर्थात राजा का उपाधि एवं एक गांव को देवान अथवा मंत्री का उपाधि दिया गया है। पड़हा व्यवस्था में गांव को राजा या मंत्री पद मिला है न कि किसी व्यक्ति को। इसलिए विशेष परिस्थिति में उस गांव का कोई भी व्यक्ति उस पद का प्रतिनिधित्व कर सकता है। पदधारी चुनने की प्रक्रिया – कहीं-कहीं वंशानुगत है और कहीं-कही्ं  दैवीय आस्था विधि या पाय रेंगवाना विधि द्वारा सम्‍पादित होता है।

उपरोक्त चर्चाओं एवं तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि रूढ़ी-प्रथागत व्‍यवस्‍था का पक्षधर बनना है, जिसपर संसदीय कानून भी सहमत है, तो उसपर चलने के लिए बुनियादि पड़हा, ग्राम व्यवस्था को स्वीकार करना ही पड़ेगा, तभी आगे का रास्ता अग्रसर हो सकेगा।
रूढ़ीप्रथा ग्रामसभा पड़हा बिसुसेन्दरा 2025, सिसई-भरनो, गुमला (झारखण्ड) द्वारा पारित नियमावली की प्रभाग 4, कंडिका 32 में ग्रामसभा संचालन हेतु दिशा निर्देश प्राप्त है –
       कंडिका 32 – बिसुसेन्दरा 2025 में पारित नियम का अनुपालन, प्रत्येक गाँव में पारम्परिक तरीके से चले आ रहे पद्दा पंच्चा (ग्राम सभा) के माध्यम से सम्पादित किया जाएगा। पद्दा पंच्चा में किसी पद्दा (गाँव) के खेवट-खतियान में दर्ज सामाजिक कार्यों के निर्वाहक रूढ़ीगत न्यायपंच सदस्य होंगे जो निम्नांकित तरीके से सम्पादित होते हैं – 
    (क) नैगस/पहान (भुँईहरी पहनई)। 
    (ख) माहतो (भुँईहरी महतवई)। 
    (ग) पुजरस (भुँईहरी पुजरई)। 
    (घ) करठा (कण्टहा के जैसे कार्य करनेवाले)।
    (ङ) भँड़ारी परिवार से एक मनोनित सदस्य। 
    (च) जेठ रैयत परिवार से एक मनोनित सदस्य। 
    (छ) गौंरो परिवार से एक मनोनित सदस्य। 
    (ज) पेल्लो कोटवार 
    (झ) जोंख़ कोटवार
    (ञ) मुक्का चेतगर (महिला प्रशिक्षित)। 
    (ट) मेःत चेतगर (पुरूष प्रशिक्षित)। 
    (ठ) गांव के सभी वयस्क महिला एवं पुरूष, ग्राम सभा का सदस्य होंगे।
इसी तरह पड़हा संचालन हेतु पारित नियमावली प्रभाग 3, पारा (ङ) में कहा गया है कि – पड़हा गांव में से एक गांव को पड़हा बेल, एक गांव को पड़हा देवान तथा एक गांव को पड़हा कोटवार का उपाधि दिया गया है और उसी के अनुसार पडहा का संचालन किया जाता है। इस तरह पड़हा बैठक की अध्यक्षता हेतु पड़हा बेल को स्वाभाविक जिम्मेदारी मिला हुआ है।

आलेख एवं विचार – 
बिरसा उरांव, ग्राम: भुरसो, सिसई, गुमला। 
जिय उरांव, ग्राम: जलका, सिसई, गुमला।
(झारखण्ड)।   दिनांक 17.06.2025