औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति क्यों चाहिए?

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आजादी के पचहत्तर साल बाद भी भारत अंग्रेज और अंग्रेजियत (औपनिवेशिक  गुलामी) से मुक्त नहीं हुआ है”—इस उक्ति को यदि गहराई से समझें, तो यह किसी भौतिक गुलामी की नहीं बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक और वैचारिक गुलामी की ओर संकेत करती है। भारत ने 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त की, परंतु औपनिवेशिक सत्ता द्वारा निर्मित ढाँचे, सोच और मूल्य आज भी कई रूपों में जीवित हैं। इसे निम्नलिखित बिंदुओं में विस्तार से समझा जा सकता है—
1. औपनिवेशिक मानसिकता (Colonial Mindset) – 
अंग्रेजों की सबसे स्थायी विजय भारतीय मानस पर कब्ज़ा थी। मैकॉले की शिक्षा नीति का उद्देश्य ही था—“ऐसे लोग पैदा करना जो रंग से भारतीय हों, पर सोच से अंग्रेज।”
आज भी— अंग्रेज़ी भाषा को बुद्धिमत्ता, आधुनिकता और श्रेष्ठता का प्रतीक माना जाता है और भारतीय भाषाओं में सोचने वालों को ‘पिछड़ा’ समझा जाता है।
* ज्ञान की कसौटी पश्चिमी मानकों से तय होती है – 
यह मानसिकता बताती है कि गुलामी सत्ता के जाने से नहीं, सोच के बदलने से खत्म होती है, जो अभी तक अधूरी है। हमें अपनी स्थानीय  या भारतीय  सोच की आवश्यकतानुसार शिक्षा, तकनीक,  व्यवसाय, कृषि, प्रशासन, कोर्ट- कचहरी  आदि  संबंधी कार्य  व योजनाओं  को विकसित  करना है।
2. प्रशासनिक ढाँचा: अंग्रेजी राज की निरंतरता – 
स्वतंत्र भारत का प्रशासनिक ढाँचा लगभग वही है जो अंग्रेजों ने बनाया था—
* IAS, IPS, राजस्व व्यवस्था।
* दमनकारी कानूनों की परंपरा।
* जनता से दूरी बनाए रखने वाली नौकरशाही।
अंग्रेजों ने प्रशासन शासन करने के लिए बनाया था, न कि सेवा के लिए। इसलिए 
आज भी आदिवासी, दलित, किसान और गरीब वर्ग इसी दमनकारी व्यवस्था का शिकार हैं।आदिवासी इलाकों में पुलिस और प्रशासन आज भी औपनिवेशिक सत्ता की तरह व्यवहार करती है और उसकी मानसिकता, चरित्र, व्यवहार में  वही दबंगियत कायम है।
3. कानून व्यवस्था: उपनिवेशकालीन कानूनों की छाया – भारत आज भी कई ऐसे कानूनों से संचालित है—
* राजद्रोह कानून (Sedition Law)।
* आपराधिक कानूनों की कठोरता।
* वन कानून, भूमि अधिग्रहण कानून।
ये कानून अंग्रेजों ने विद्रोह दबाने और संसाधनों पर कब्ज़ा के लिए बनाए थे ताकि प्रशासनिक कड़ाई और दबंगई बनी रहे।
आज भी वही कानून जनता के खिलाफ हथियार बने हुए हैं, विशेषकर—
* आदिवासी।
* मजदूर।
* सामाजिक आंदोलनकारियों के लिए। 
यह दर्शाता है कि राज्य की आत्मा अब भी औपनिवेशिक है।
4. शिक्षा प्रणाली: आत्मविस्मृति का उपकरण।
आज की शिक्षा—
* भारतीय इतिहास को आज भी औपनिवेशिक दृष्टि से पढ़ाया जाता है। जिसे हम भारतीय  कह रहे हैं दुर्भाग्य  से वह भी औपनिवेशिक  विरासत  की देन है।
* स्वतंत्रता के बाद  आज भी आदिवासी, लोक, स्त्री और बहुजन ज्ञान को हाशिये पर रखा जाता है। 
* रोजगारपरकता को ज्ञान का एकमात्र लक्ष्य माना जा रहा है। इसके विकल्प  के बारे नहीं सोचा जाता।
भारत की प्राचीन, आदिवासी और लोक ज्ञान परंपराएँ —
औषधि, प्रकृति, सामुदायिक जीवन, भाषा और दर्शन— आज भी इन्हें ‘अकादमिक ज्ञान’ नहीं मानी जातीं। हालांकि सरकारी स्तर इस पर कार्य  करने का प्रयास  दिखता है लेकिन  सभी गतिविधि , आयोजन आदि जब कार्पोरेट हित में होने लगते हैं तो फिर लगता है जनता दूसरी गुलामी की ओर बढ़ रही है।
यह शिक्षा, व्यक्ति को अपनी जड़ों से काटकर एक उपभोक्ता नागरिक बनाती है—ठीक वही उद्देश्य जो अंग्रेजों का था।
5. सांस्कृतिक गुलामी: अंग्रेजियत की नकल जारी है।
आज भी—
* पश्चिमी जीवनशैली को आधुनिक माना जाता है।
* देसीपन को पिछड़ापन मानने का दृष्टिदोष हाबी है। 
* आदिवासी संस्कृति को ‘फोक’ या ‘एग्जॉटिक’ कहा जाता है। 
टीवी, सिनेमा, फैशन और विज्ञापन —
* शहरी और अंग्रेज़ी बोलने वाले वर्ग को आदर्श और उच्च माना जाता  है।
* बहुसंख्यक भारतीय जीवन को भी  हास्यास्पद या गौण दिखाया जाता है।
यह संस्कृति की गुलामी है—जहाँ अपनी पहचान से शर्म और विदेशी पहचान से गर्व सिखाया जाता है।
6. आर्थिक संरचना: नए रूप की लूट।
अंग्रेजों की तरह ही आज भी —
* प्राकृतिक संसाधनों की लूट जारी है।
* आदिवासी भूमि का अधिग्रहण जारी है।
* कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता दिया जा रहा है।
अंतर सिर्फ इतना है — पहले लूट अंग्रेज करते थे, आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और देसी शासक वर्ग।
यह नव-उपनिवेशवाद (Neo-Colonialism) है, जहाँ सत्ता बदली है, शोषण नहीं।
7. आदिवासी संदर्भ में अंग्रेजियत की निरंतरता – 
हमारे अध्ययन क्षेत्र (आदिवासी साहित्य, सिनेमा और सरना दर्शन) के संदर्भ में देखें तो-
* जल-जंगल-जमीन पर आज भी राज्य का कब्ज़ा है।
* आदिवासी ज्ञान को पिछड़ा और विकास विरोधी कहा जाता है।
* सरना धर्म और आदिवासी आस्था को मान्यता नहीं दिया जाता है ।
ये सभी अंग्रेजी शासन की नीतियों की निरंतरता हैं।
अंग्रेजों के लिए आदिवासी ‘जंगली’ थे,और आज भी वे ‘अविकसित’ कहे जाते 
हैं। सत्ता बदली,शब्द बदले हैं लेकिन दृष्टिकोण नहीं बदला क्योकि प्रशासनिक  व्यवस्था, नियम-कानून आदि नहीं बदले।
निष्कर्ष- यह उक्ति हमें चेतावनी देती है कि—
* राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है जब तक मानसिक, सांस्कृतिक,आर्थिक,  सामाजिक और वैचारिक मुक्ति न हो।
* अंग्रेज चले गए, पर अंग्रेजियत की सत्ता, सोच और व्यवस्था में बनी  हुई है।
* सच्ची आज़ादी तभी होगी जब — 
         – अपनी भाषाएँ, ज्ञान और संस्कृति केंद्र में हों।
          – शासन, सेवा में बदले। 
          – विकास की परिभाषा आदिवासी और बहुजन के जीवन स्रोत से निकले।
* रोजगारपरकता के बदले सामूहिक,  सामुदायिक,  परस्पर सहयोग, सम्मान  की एकजुट सामुदायिक  टिकाऊ जीवन जीने पर विश्वास  और कार्य बढ़े। 
लेकिन, संकट यह है कि  आज भी भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र से अधिक एक स्वतंत्र झंडे के नीचे औपनिवेशिक सोच वाला समाज बना हुआ है।

जो मूल उक्ति— “आजादी के बाद औपनिवेशिक  मानसिकता से मुक्ति”—को आदिवासी दृष्टिकोण, सामाजिक यथार्थ और आंतरिक संघर्ष  से और प्रभावी बनाना पड़ेगा तभी आदिवासियों, दलित आदि का भला हो सकता है। महत्वपूर्ण  यह है कि अंग्रेजियत (औपनिवेशिक मानसिकता) की मानसिकता, संस्कार, व्यवहार , भेद-भाव, शोषण आदि से मुक्ति।  साथ ही  स्थानीय, आदिवासी मूल्य,  सोच, आदर्श, शिक्षा, व्यवहार , विरासत,  कला, कृषि, परंपरा, भाषा आदि को आधुनिकता व विद्यमान  विभिन्न परिस्थितियो के संदर्भ  में  समझना होगा तभी हम सम्मानपूर्ण, शांतिपूर्ण जीवन  जीने में समर्थ  होंगे।

महादेव टोप्पो
हरमू, रांची।

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