जनजातीय भाषा विभागाध्यक्ष डॉ० मुण्डा द्वारा तोलोंग सिकि की पहली पुस्तक का लोकार्पण

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दिनांक 13 अप्रैल 1994 को राँची कालेज‚ राँची के सभागार में सरना नवयुवक संघ‚ राँची के सौजन्य से आयोजित‚ सरहुल पूर्व संध्या के अवसर पर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग‚ रांची विश्वविद्यालय‚ रांची के विभागाध्यक्ष सह भाषाविद डॉ० रामदयाल मुण्डा द्वारा तोलोंग सिकि (लिपि) की पहली पुस्तक ‘‘कुड़ुख़ तोलोंग सिकि अरा बक्क गढ़न’’ को लोकार्पित किया गया। ‘‘कुँड़ुख़ तोलोङ सिकि अरा बक्क गढ़न’’ नामक यह पुस्तक तोलोंग सिकि की पहली पुस्तक है‚ जो आधुनिक प्रिटिंग प्रेस‚ उषा इन्डस्ट्रीज‚ भागलपुर (बिहार) में छपकर समाज के सामने पहूँची। 
इस पुस्तक को लोकार्पण करते हुए डॉ० मुण्डा जी ने डॉ० नारायण उराँव को समाज के चिंतनशील लोगों के सामने परिचय कराया। साथ ही डॉ० मुण्डा ने कहा कि आने वाले समय में ऐसी लिपि के विकास की आवयकता होगी। यदि अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित एवं सुरक्षित रखना है तो अपनी भाषा की पढाई-लिखाई के लिए अपना शैली अथवा अपना तरीका भी विकसित करना ही पड़ेगा। आज डॉ० नारायण उरांव का यह प्रयास भले ही शैशव काल में हो पर इसका शुभारंभ हो चुका है और समाज में जो संघर्ष करता वही आगे बढ़ता है तथा अपने लक्ष्य तक पँहुचता है। 
रिपोर्टर –
भुनेश्वर उराँव
सहायक शिक्षक,
जतरा टाना भगत विद्या मंदिर,
बिशुनपुर, घाघरा, गुमला।

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