डॉ मुण्डा एवं डॉ इन्दु धान की उपस्थिति में तोलोङ सिकि (लिपि) का लोकार्पण   

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डॉ॰ रामदयाल मुण्डा‚ पूर्व कुलपति‚ राँची विष्वविद्यालय‚ राँची एवं डॉ॰ (श्रीमती) इन्दु धान‚ पूर्व कुलपति‚ मगध विश्व्विद्यालय् बोधगया एवं सिद्हु-कान्हु मुरमु विश्वमविद्यालय‚ दुमका द्वारा संयुक्त रूप से एक संवादाता सम्मेलन में दिनांक 15 मई 1999 को तोलोंग सिकि (लिपि) को जनमानस के व्यवहार के लिए लोकार्पित किया गया। यह संवादाता सम्मेलन – तोलोंग सिकि प्रचारिणी सभा‚ रांची‚ सिरासिता प्रकाशन‚ रांची एवं ट्राईबल रिसर्च एनालिसिस कम्युनिकेशन एण्ड एजूकेशन नामक संस्था की ओर से झारखण्ड क्षेत्र की भाषाओं के विकास के लिए विकसित तोलोंग सिकि नामक लिपि को जनमानस के व्यवहार के लिए लोकार्पित करने हेतु आयोजित किया गया था। 

Lokarpan
संवादाता सम्मेलन में पूर्व कुलपति‚ डॉ॰ रामदयाल मुण्डा ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि – 
1॰ झारखण्ड क्षेत्र की भाषाओं के विकास के लिए नई लिपि का विकास कर लिया गया है।
2॰ इस लिपि का नाम तोलोंग सिकि है। 
3॰ कालेजों में पढ़ाई-लिखाई तथा परीक्षा के उत्तर पुस्तिकाओं के जांच की व्यवस्था जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग द्वारा किया जाएगा।
4॰ राज्य सरकार से इस लिपि की मान्यता के लिए प्रयास किया जाएगा।
नई लिपि तोलोंग सिकि के जनक डॉ॰ नारायण उरांव ने अपने वक्तव्य में कहा कि – विगत 7 से 8 बर्षों के निरंतर प्रयास तथा अनेकों कार्यशाला कर यह लिपि विकसित हुई है जिसमें झारखण्ड क्षेत्र के आंदोलनकारियों एवं आदिवासी बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा योगदान है। इस लिपि को बिहार जनजातीय कल्याण शोध संस्थान‚ मोरहाबादी‚ रांची में दिनांक 19 सितम्बर 1998 को आयोजित एक कार्यशाला में कुँड़ुख़ भाषियों द्वारा कुँड़ुख़ भाषा की लिपि के रूप में स्वीकार किया गया है तथा पठन-पाठन एवं साहित्य सृजन किये जाने का संकल्प लिया गया है। 
इस संवादाता सम्मेलन में डॉ॰ रामदयाल मुण्डा‚ डॉ॰ (श्रीमती) इन्दु धान‚ डॉ॰ नारायण भगत‚ डॉ॰ नारायण उराँव‚ प्रो0 (श्रीमती) मीना टोप्पो‚ श्री मनोरंजन लकड़ा‚ श्री हिमांषु कच्छप‚ श्री मनोहर लकड़ा् श्री महेश भगत एवं श्री साधु उराँव उपस्थित थे। 
इस विषय पर दैनिक समाचार पत्रों में दिनांक 16 मई 1999 को विस्तृत रिर्पोट प्रकाशित हुई है।

Dr Narayan Bhagat
आलेख संपादन –
डॉ॰ नारायण भगत
असिस्टेन्ट प्रोफेसर
डोरण्डा कॉलेज‚ रांची।

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