अनेक बाधाओं के बावजूद कीर्तिमान की मुख्‍य धारा में गोते लगा रहे हैं आदिवासी

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जब हम आदिवासी युवाओं की ओर देखते हैं तो लगता है उनके सामने बाधाओं की गहरी खाई और कंटीली राह खड़ी कर दी गई है। पढ़ने-लिखने, छात्रवृत्ति, नौकरी, आरक्षण से लेकर भाषा, संस्कृति, धर्म, जीवन-शैली, खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा आदि को लेकर इनके सामने इतने प्रश्न और समस्याएं खड़ी कर दी जाती हैं बेचारे का माथा चकरा जाता है कि वह क्या करे क्या न करे। वह कई बार दिग्भ्रमित हो जाता है। कई बार दवाब में आकर आदिवासियों के पारंपरिक कमजोरी – शराबखोरी का शिकार हो जाता है। वह अपने गैर-आदिवासी मित्रों की तरह कई बार पढ़ाई कर नहीं पाता, बोल नहीं पाता। अच्छे अंक ला नहीं पाता। उनकी तरह ठाठ से रह नहीं पाता तो निश्चय ही ग्रामीण परिवेश से शहर आए हमारे अधिकांश युवा कुंठित होने लगते हैं। उन्हें लगता है कि आदिवासी होना बेकार है। यह सोच आते ही सबसे पहले वह अपनी भाषा से दूरी बनाने लगता है। फिर मुख्य-धारा के मित्रों की तरह व्यवहार करने के लिए औकात से ज्यादा बेहतर रहन-सहन और वेश-भूषा में रहने की चेष्टा करने लगता है। अपने धर्म, परब त्योहारों को हेय मानने लगता है। या इन पर्ब त्योहारों में वह मुख्य-धारा के तत्वों को शामिल करने या उन जैसा बनने की नकल करने लगता है।

इन सबका परिणाम यह होता है कि वह अपनी भाषाई, जातीय, सामाजिक पहचान खोने लगता है। उसके मन में एक तरह की हीनता आने लगती है और वह इससे मुक्ति के लिए अपने समाज की जड़ों से जुड़ी पहचान को भूलने या कटने का प्रयास करने लगता है। होली, दशहरा क्यों मनाया जाता है यह सभी बतायेंगे लेकिन करम, सरहुल, सोहराई या बाहा क्यों मनाते हैं इसके बारे कम जानकारी रखते हैं या नहीं ऱखते हैं। फिल्मी गीत गा लेंगे, आधुनिक नागपुरी गीतों पर झूम लेंगे लेकिन हम अपने लोकगीत नहीं गा पा रहे हैं। हम मांदर बजाना भूल रहे हैं। पुरखा-सीख भूल रहे हैं। अगर किसी युवा से कुछ पूछो तो वह ऐसा व्यवहार करता है मानो वह सब कुछ जानता है। यह एक तरह का मिथ्या-आत्मविश्वास युवाओं के लिए घातक हो रहा है। मोबाइल में कुछ लिखकर और लाइक पाकर लगता है कि हमने बहुत पा लिया सोचना घातक है।

लेकिन असल बात है रोजी-रोटी और आजीविका के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना। यह कर नहीं पा रहे हैं। परिस्थितियाँ रोज उनके विपरीत होती जा रहीं है। कभी छात्रवृति नहीं मिल रहा है तो कहीं दाखिले के लिए जाति-प्रमाण-पत्र, आय प्रमाण पत्र आदि के लिए युवा दौड़ लगा रहे हैं। पढ़ाई का एक अच्छा खासा समय इसे प्रबंध करने में  लग जाता है। किसी लड़के ने कहा कि – वह  फलां विषय पढ़ेगा तो अभिभावक का जोर होता है वह साइन्स पढ़े और इंजीनियर बने। अधिकांश अभिभावक बच्चों को इंजीनियर ही बनाने का ख्वाब देखते हैं। बहुत हुआ तो डॉक्टर या बीडीओ, सीओ या पी।ओ। ऐसे में आदिवासी युवाओं के सपने, आशाएं और महत्वाकांक्षाएँ भी सीमित हो जाती हैं। हमारा सामाजिक परिवेश भी ऐसा ही है कि हम सभी सीमित सपने देखने के आदी हो गए है।

कई छात्र-छात्राओं से मिला हूँ जिनके सपने सीमित हैं जबकि मैं देख रहा होता हूं कि वे थोड़ा और परिश्रम करें तो वे बेहतर नौकरी का तलाश कर सकते हैं या कैरियर के लिए एक बेहतर विकल्प चुन सकते हैं। लेकिन, ऐसा नहीं होता है। कुछ साल पहले तक इंजीनियर, डॉक्टर, बीडीओ, सीओ की नौकरी के अलावा कुछ और सलाह देने पर माना जाता था कि कोई उसे भड़का रहा है या भटका रहा है। लेकिन आज इस सोच में थोड़ा सा परिवर्तन होते देखा जा रहा है और कुछ आदिवासी युवाओं को एमबीए की पढ़ाई कर नौकरी करने के बदले हिम्मत और साहस दिखाते हुए अपना व्यवसाय आरंभ करते देखा जा है। जो एक नई प्रवृत्ति है। कुछ युवाओं ने पारंपरिक शिक्षक की नौकरी से अलग तरह की नौकरी की हैं। हम बने-बनाए खाँचे की नौकरी के बारे ही सोच पाते हैं लेकिन इससे अलग तरह की संभावनाशील नौकरी या आजीविका के बारे में सोच नहीं पाते। अपनी रुचि और क्षमता के हिसाब से हम आजीविका के नये रास्ते तलाश सकते हैं।

कुछ उदाहरण देना उपयुक्त होगा। रांची के रेडीसन ब्लू होटल के शेफ रामचन्द्र उराँव हैं। वे भोजन के विभिन्न व्यंजन बनाते हैं और उन्होंने कई बार अपने होटल में ट्राइब्ल फूड फेयर आयोजित कर आदिवासी व्यंजनों को लोकप्रिय बनाने का कार्य किया है। फलतः आज छिलका रोटी, धूसका जैसे कई आदिवासी वृहत भारतीय समाज में लोकप्रिय हो रहे हैं।

भानु टुडू, रोशन टेटे, सुमंगल नाग फैशन डिजाइनर हैं और वे आदिवासी परिधानों को नये स्वरूप में लोकप्रिय बनाने के लिए काम कर रहे हैं। भानु जब बंगलोर में पढ़ाई कर रहे थे तो उसके दोस्त उस पर हंसते थे कि वह रिजर्व कोटा का होने के कारण ही फैशन की पढ़ाई कर पा रहा है। लेकिन, आज वह अपनी कल्पनाशीलता की वजह से अपने उन मित्रों से बेहतर स्थिति में है।

हाल ही में डॉ। मुकुट मिंज को पद्मश्री से नवाजा गया। क्यों? क्योंकि वे किडनी का ऑपरेशन करनेवाले देश के श्रेष्ठ शल्य-चिकित्सकों में से एक हैं और उन्होंने देश के विदेश मंत्री का सफल किडनी ऑपरेशन किया था। आज भले रिजर्व कोटे को लेकर लोग योग्यता का सवाल उठाएं लेकिन ऐसे समर्पित और लगनशील लोगों ने आदिवासियों का नाम रोशन किया है और भावी पीढ़ी को राह दिखाई है।

फिल्म जैसे जटिल पेशे में भी शिवशंकर देवगम जैसे प्रतिभाशाली डायरेक्टर ने फ्रोजन जैसी फिल्म बनाकर दर्जन से अधिक पुरस्कार जीत चुके हैं। वे हो समुदाय से हैं। महादेव हांसदा, सेराल मुर्मू, बीजू टोप्पो, निरंजन कुमार कुजूर, रंजित उराँव क्रमशः संताली और कुंड़ुख में फिल्में बनाकर कई नेशनल, इंटरनेशनल सम्मान, पुरस्कार पा रहे हैं।

दिलीप कुमार टोप्पो एक प्रसिद्ध मूर्तिकार हैं और उनकी कई कलाकृतियों को आजकल देश भर में प्रशंसा मिल रही है। रांची, गुमला में उनकी कई कलाकृतियाँ लोगों द्वारा प्रशंसित हैं। पत्थर की उनकी कलाकृतियआँ कई बार इतनी बड़ी होती हैं कि उन्हें ट्रक में या तीन चार सूमो जैसी गाड़ियों में ले जाना होता है।

मादी लिंडा, हरीश मिंज, अरुणदेव मुर्मु, निर्मला मिंज, हेनरी केरकेट्टा, सजित मिंज, सी।आर। हेम्ब्रम, विश्वनाथ लकड़ा आदि कई ऐसे नाम हैं जिनकी कलाकृतियों ने कलाप्रेमियों का ध्यान आकृष्ट किया है। प्रकाश सिंह मुण्डा क्रिकेट में उभरता नाम है। वहीं विल्फ्रेड बेंग जूनियर क्रिकेट के कप्तान रह चुके हैं। प्रियंका केरकेट्टा लाँग जंप में राष्ट्रीय स्तर के खेल में पदक जीत चुकी हैं। वर्तमान में संजय बालमुचू, टाटा फुटबॉल अकादमी से प्रशिक्षण पाकर आई एस एल फुटबॉल लीग में चेन्नियन एफ सी से खेलने वाले झारखंड के खिलाड़ी हैं।पड़ोसी राज्य उड़ीसा से जौना मुर्मू रिले रेस में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुकी हैं। यहीं से मीरा रानी हेम्ब्रम, संयुक्ता मुण्डा, हुपी मांझी, मंजूलता प्रधान, भाग्यलक्ष्मी बारीक भारतीय महिला रग्बी टीम की सदस्य हैं। हॉकी में तो कई नाम हैं ही। अभी अजलान शाह हॉकी कप प्रतियोगिता के एक मैच में, मलेशिया में कल ही शिलानंद लकड़ा ने गोल मारकर अपनी उपस्थिति दर्ज कर दी है।

जमशेदपुर के जेरोम सोरेन को कृषि एवं पशुपालन के क्षेत्र में इन्नोवेटिव फार्मर के अवार्ड से नवाजा जाने की सूचना मिली है। सगुन सुपाड़ी नृत्य करते हुए बिजोली मुर्मू ग्यारह पीतल के घड़े सिर पर ढोकर नृत्य करती हैं। ये चंद नाम हैं जो याद आए तो उनका उल्लेख कर दिया। अनुप्रिया लकड़ा उड़ीसा से है और पहली आदिवासी महिला पाइलट हैं तो वहीं रेनी कुजूर, सलोनी उराँव ने मॉडलिंग में काम करके लोगों को चौंकाया है।

लेकिन यह सब उदाहरण देने का असली मकसद यह है कि आदिवासी युवा देखें कि आज किसी भी फील्ड में अब वे पहले की तरह पीछे नहीं है। वे क्लर्क, पीयून, टीचर, नर्स, आया आदि काम करने से ऊपर की योग्यता भी हासिल कर चुके हैं। रोज नई प्रतिभाएँ विभिन्न क्षेत्रों में जुड़ती चली जा रहीं है। यह सही है कि उचित मार्गदर्शन, गरीबी और कई बार अवसर चूक जाने के कारण निराशा, हताशा होती है। लेकिन यदि युवा सचेत, सजग और अपनी असली प्रतिभा को पहचानने में सफल रहे जो निश्चय ही बड़े से बड़ा काम करके दिखा सकते हैं। यही बात हमारे अभिभावकों को भी समझना चाहिए है। वे हमारे बच्चों की प्रतिभा को पहचानें, निखारें क्योंकि आज अगर किसी के अंदर कोई प्रतिभा है तो आपकिसी भी क्षेत्र में सबसे ऊँचे स्थान तक पहुंच सकते हैं। विश्वास करें यदि कुछ कर दिखाने का जज्बा, साहस, लगन, धैर्य व मेहनत करने की इच्छा आपमें कूट-कूटकर भरी है तो अनेक बाधाओं के बावजूद आप अपनी मनचाही मंजिल पा सकते हैं।

 महादेव टोप्‍पो

-महादेव टोप्पो

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