कुड़ुख़ समुदाय: भाषाई पुनरुत्थान, सांस्कृतिक विरासत एवं सामाजिक सशक्तिकरण

कुड़ुख़ समुदाय: भाषाई पुनरुत्थान, सांस्कृतिक विरासत एवं सामाजिक सशक्तिकरण पर विस्तृत रिपोर्ट

  1. प्रस्तावना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कुड़ुख़ (उरांव) समुदाय भारत की एक ऐसी आदिम नृवंशविज्ञान पहचान है, जिसका इतिहास गौरव, संघर्ष और निरंतर प्रवास का मिश्रण रहा है। इस समुदाय की ऐतिहासिक जड़ों और दक्षिण से उत्तर भारत की ओर उनके विस्थापन का प्रमाणिक विवरण श्री योगेश्वर उरांव (असम राज्य वित्त सलाहकार) की शोधपरक पुस्तक ‘उरांवों के दक्षिण से उत्तर भारत की यात्रा’ में विस्तार से मिलता है। इस यात्रा क्रम में ‘रोहतासगढ़’ मात्र एक भौगोलिक स्थान या किला नहीं है, बल्कि यह उरांव समुदाय की सामाजिक-राजनीतिक चेतना का उपरिकेंद्र (Epicenter) और उनकी अटूट वीरता का प्रतीक है। ऐतिहासिक शोधों के अनुसार, रोहतासगढ़ उरांवों की प्राचीन व्यवस्था और उनके गौरवशाली अतीत का वह आधार स्तंभ है, जहाँ से उनकी सांस्कृतिक अस्मिता को एक निश्चित आकार मिला।

  1. भाषाई विकास और तोलोंग सिकि लिपि

कुड़ुख़ समुदाय की भाषाई अस्मिता को पुनर्जीवित करने के लिए ‘तोलोंग सिकि’ लिपि का विकास एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है। वर्तमान में इस लिपि के माध्यम से भाषाई पुनरुत्थान के प्रयास निम्नलिखित महत्वपूर्ण चरणों में देखे जा सकते हैं:

  • तोलोंग सिकि के जनक और सम्मान: लिपि के प्रवर्तक डॉ. नारायण उरांव को उनके अतुलनीय योगदान हेतु 21 फरवरी 2026 को ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ के अवसर पर प्रेस क्लब, रांची में ‘झारखंड साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से विभूषित किया गया। यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि तोलोंग सिकि की आधिकारिक स्वीकार्यता का परिचायक भी है।
  • शैक्षणिक मानकीकरण की मांग: उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तोलोंग सिकि को स्थान दिलाने हेतु कार्तिक उरांव आदिवासी कुडुख स्कूल, मंगलो, सिसई के प्रधानाध्यापक और 9+7+6 पड़हा (22 गाँव) के प्रतिनिधियों द्वारा बी.एन. जालान महाविद्यालय, सिसई में कुड़ुख़ भाषा की पढ़ाई इसी लिपि के माध्यम से कराने की मांग पुरजोर तरीके से की गई है।
  • संस्थागत सुदृढ़ीकरण: टाटा स्टील फाउंडेशन के सहयोग से संचालित बलसोता केंद्र जैसे तोलोंग सिकि सह कुड़ुख़ भाषा शिक्षण केंद्र जमीनी स्तर पर बच्चों को अपनी लिपि से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
  • राष्ट्रीय समन्वय: कुड़ुख़ लिटरेरी सोसायटी ऑफ इंडिया द्वारा झारसुगुड़ा, ओड़िशा में आयोजित 18वां राष्ट्रीय अधिवेशन इस बात का साक्ष्य है कि यह आंदोलन अब एक अखिल भारतीय स्वरूप ले चुका है।
  • JAC के साथ ऐतिहासिक संघर्ष: झारखंड अधिविद्य परिषद (JAC), रांची में तोलोंग सिकि की मान्यता और विकास हेतु संघर्ष का इतिहास काफी पुराना है। इसका विधिवत प्रयास वर्ष 2008 में प्रथम आवेदन समर्पित करने के साथ ही प्रारंभ हो गया था, जो समुदाय की भाषाई दृढ़ता को दर्शाता है।
  1. सांस्कृतिक उत्सव और मान्यताएँ

कुड़ुख़ समुदाय का सांस्कृतिक ढांचा प्रकृति और इतिहास के प्रति उनकी गहरी निष्ठा पर टिका है।

सरहुल (Sarhul)

सरहुल झारखंड का सर्वाधिक जीवंत वसंत उत्सव है, जो न केवल नव वर्ष का स्वागत है, बल्कि प्रकृति और मानव के अटूट संबंध का उत्सव भी है। सांस्कृतिक नियमावली के अनुसार, यह उत्सव अनिवार्य रूप से तीन दिनों की अवधि तक मनाया जाता है, जिसमें पाहन और समुदाय मिलकर नए फूलों के आगमन और कृषि चक्र के प्रारंभ का स्वागत करते हैं।

सांस्कृतिक प्रतीक और ऐतिहासिक स्मृति

रोहतासगढ़ के प्रति समुदाय का दृष्टिकोण मात्र एक पुरातात्विक स्थल का नहीं, बल्कि एक जीवंत ऐतिहासिक विरासत का है। यह स्थल उनके पूर्वजों के शौर्य और प्राचीन गणतांत्रिक स्वशासन की स्मृतियों को संजोए हुए है, जो आधुनिक दौर में भी उनकी सांस्कृतिक अस्मिता को ऊर्जा प्रदान करता है।

  1. सामुदायिक सशक्तिकरण और स्वशासन संरचना

कुड़ुख़ समुदाय की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था ‘पड़हा’ को आधुनिक न्यायशास्त्र के साथ समन्वित करने के गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं:

  • पद्दा पड़हा नेवईपंच्चा (न्यायपंच नियमावली 2025): ग्राम सभा पड़हा न्यायपंच नियमावली 2025 का निर्माण सामुदायिक स्तर पर न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। यह नियमावली पारंपरिक ‘नेवई’ (न्याय) को संवैधानिक मर्यादाओं के साथ जोड़ती है।
  • कोटवार प्रशिक्षण: TEAM (Tribal Education Awareness Management) धुमकुड़िया के नेतृत्व में समन्वयक (कोटवार) प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। 23 नवंबर 2025 को रांची में आयोजित कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक प्रबंधन में आधुनिक दक्षता लाना था।
  • युवा चेतना शिविर: सराजपुर, सुंदरगढ़ (ओड़िशा) में आयोजित तीन दिवसीय ‘आदिवासी सरना युवा प्रशिक्षण शिविर’ इस बात का प्रमाण है कि युवा पीढ़ी को नेतृत्व और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
  1. दार्शनिक चिंतन और सामाजिक चुनौतियाँ

कुड़ुख़ समुदाय के समक्ष वर्तमान में वैचारिक और भाषाई संप्रभुता को लेकर गंभीर चुनौतियां हैं, जिनका सार यहाँ प्रस्तुत है:

Key Insights: वि-उपनिवेशीकरण एवं भाषाई संप्रभुता

  • औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति: स्वाधीनता के 75 वर्षों के उपरांत भी ‘अंग्रेजियत’ का प्रभाव मानसिक रूप से बना हुआ है। समुदाय के बौद्धिक वर्ग का मानना है कि वास्तविक स्वावलंबन के लिए औपनिवेशिक गुलामी के इस वैचारिक ढांचे को तोड़ना अनिवार्य है।
  • भाषाई संप्रभुता: कुड़ुख़ भाषा-सेवियों के अनुसार, भाषाई चुनौतियों का समाधान तकनीकी सुलभता और लिपि के मानकीकरण में निहित है। तोलोंग सिकि को डिजिटल युग के अनुकूल बनाना ही भविष्य की दिशा है।
  • वि-उपनिवेशीकरण की आवश्यकता: औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति केवल एक नारा नहीं, बल्कि समुदाय के भाषाई, सामाजिक और आर्थिक विकास की अनिवार्य शर्त है।
  1. श्रद्धांजलि और प्रेरणापुंज (Obituaries)

कुड़ुख़ समुदाय ने हाल के दिनों में अपने उन महापुरुषों को खोया है जिन्होंने समाज की दिशा तय करने में अपना जीवन अर्पित कर दिया:

नाम परिचय एवं विशिष्ट योगदान

डॉ रामदयाल मुण्‍डा प्रख्‍यात शिक्षाविद् अलग झारखंड आंदोलन एवं तोलोंग सिकि निर्माण के प्रेरणा स्‍त्रोत एवं तोले
डॉ. करमा उरांव प्रख्यात शिक्षाविद् एवं वरिष्ठ सामाजिक नेतृत्वकर्ता; सामुदायिक चेतना के प्रखर स्वर।
फूलमणि उरांव वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं डॉ. नारायण उरांव की माता; 85 वर्ष की आयु में निधन।
मंगरा उरांव अद्दी कुडुख़ चाःला धुमकुड़िया पड़हा अखड़ा, रांची के वरिष्ठ कर्मयोगी सदस्य; निधन तिथि: 22.12.2025।
डॉ निर्मल मिंज, डॉ गोंझु व अन्‍य..
गुरूजी (स्‍वर्गीय शिबु सोरेने) समुदाय के परम श्रद्धेय व्यक्तित्व, जिनके महाप्रयाण पर संपूर्ण समुदाय शोकमग्न है।

  1. निष्कर्ष: भविष्य की दिशा

कुड़ुख़ समुदाय आज अपनी लिपि ‘तोलोंग सिकि’, अपनी न्याय प्रणाली ‘पद्दा पड़हा नेवईपंच्चा’ और अपनी ऐतिहासिक पहचान ‘रोहतासगढ़’ के माध्यम से एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का नेतृत्व कर रहा है। शैक्षणिक ढांचों में तोलोंग सिकि की स्वीकार्यता और युवाओं में बढ़ती सामाजिक चेतना यह सुनिश्चित करती है कि यह समुदाय अपनी जड़ों को मजबूती से पकड़ते हुए आधुनिकता के साथ कदम मिलाने के लिए पूरी तरह तैयार है। वि-उपनिवेशीकरण की यह प्रक्रिया ही आने वाले समय में कुड़ुख़ समुदाय के सर्वांगीण सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करेगी।

लेख संकलन –
डॉ0 श्रीमती ज्योति टोप्पो
सहायक प्राध्यापक, गोस्सनर कालेज, रांची।