धुमकुड़िया में फिर दीया जला रहे हैं
जंगल में तीर, धुनष, टंगिया
अखड़ा में मांदर, नगाड़ा, ढोल,ढांक, बांसुरी, ठेसका, भेंर
धुमकुड़िया के आंगन में बसुला, दउली, कुल्हाड़ी से
बनाते हल,तीर धनुष,बलुवा, कुदाल का बेंट,
बुनते कभी मछली के जाल, कभी बनाते गुलेल, कभी ढेलवाँस,
दिमाग के टोकरी में,दउरी में इससे अधिक सजा लेते थे –
बहुत कुछ हमारे आजा आजी, नाना नानी, परदादा आदि
और आज ?
आदिवासी युवा, इन सबका
अनजाना पाठ खोज रहे हैं, राह खोज रहे हैं
पहाड़ पर कोई लालटेन या ढिबरी, चमक रही हो जैसे
आधुनिक भवन के बीच, पक्के घरों में
वह अपने पुरखों का लूर-दरवाजा खटखटा रहे हैं