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title: 'तोलोंग सिकि विकासयात्रा: शिक्षाविदों से मिला था मार्गदर्शन'
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date: '2021-09-14T03:07:55+00:00'
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# तोलोंग सिकि विकासयात्रा: शिक्षाविदों से मिला था मार्गदर्शन

झारखण्ड सरकार द्वारा 06 जून 2003 को मातृभाषा शिक्षा का माध्यम (medium of  instruction of mother tongue) घोषित किया गया है तथा 18 सितम्बर 2003 को कुँड़ुख़ भाषा की लिपि के रूप में तोलोङ सिकि (लिपि) को स्वीकार किया गया। सरकार के इस निर्णय के बाद जैक द्वारा वर्ष 2009 में एक विद्यालय के लिए तथा वर्ष 2016 से सभी विद्यालयों के छात्रों के लिए कुँड़ुख़ भाषा विषय की परीक्षा तोलोंग सिकि में लिखने की अनुमति मिली। इस सरकारी प्रावधान के बाद भाषा के अग्रेतर विकास हेतु कई भाषाविदों एवं शिक्षाविदों से मार्गदर्शन मिले। उनमें से निम्नांकित के मंतब्य साहित्य  विकास में मार्गदशक है –

![Victor Tigga](https://www.kurukhtimes.com/wp-content/uploads/2021/09/victortigga.jpg)

1.  डॉ. विक्टर तिग्गा  

पूर्व कुलपति  

सिदो कान्हू मुर्मू वि.वि. दुमका (झारखण्ड)  

दिनांक : 20 फरवरी 2011

अपनी भाषा और संस्कृति किसी जाति विशेष की पहचान होती है। हमारे आदिवासी समाज में बहुत सी भाषाएँ बोली जातीं है‚ पर कुछ भाषाओं की लिपि अभी तक विकसित नहीं हो पायी है। यही कारण है कि बहुत सी भाषाएँ लुप्त होने के कगार पर हैं। किसी भाषा की लिपि उस भाषा के लिए कवच की तरह है जो उसे स्थायित्व प्रदान करता है‚ उसे लुप्त होने से बचाती है।  

डॉ. नारायण उराँव एवं उनके सहयोगियों द्वारा विकसित कुँड़ुख़ भाषा की लिपि तोलोंग सिकि इस दिशा में एक सराहनीय कदम है। इसके लिए वे सभी बधाई के पात्र हैं। 

![Misir Oraon](https://www.kurukhtimes.com/wp-content/uploads/2021/09/misiroraon.jpg)

2. श्री मिसिर उराँव  

पूर्व प्रतिकुलपति  

सिदो कान्हू मुर्मू वि. वि. दुमका (झारखण्ड)  

पूर्व कुलपति (कार्यकारी)  

तिलका मांझी विश्व्विद्यालय‚ भागलपुर (बिहार)  

दिनांक – 15 नवम्बिर 2015

समाज की पहचान उसकी भाषा एवं संस्कृति से होती है। जिसमें भाषा‚ संस्कृति के वाहक के रूप में होता है। इसलिए संस्कृति के संरक्षण हेतु उसके वाहक अर्थात उसकी भाषा को संरक्षित एवं विकसित करना आवश्यउक है। वर्तमान परिवेश में पुरखों की धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए उस भाषा की अपनी लिपि विकसित कर प्राथमिक कक्षा से विश्व विद्यालय स्तर तक पढ़ाई-लिखाई में स्थान दिया जाना चाहिए। वर्तमान भूमण्डलीकरण के दबाव से आदिवासी समाज की अस्मिता को संरक्षित एवं विकसित करने हेतु अपनी भाषा को सुरक्षित रखना जरूरी है। इसी विचारधारा से राँची विश्वहविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग खोला गया और मुझे कुँड़ुख़ टेस्टबुक कमिटि का सदस्य की जिम्मेदारी मिली। भाषा बचाव एवं इसे अगली पीढ़ी तक ले जाने की दिशा में कुँड़ुख़ समाज के बुद्धिजीवियों ने तोलोंग सिकि (कुँड़ुख़ भाषा लिपि) विकसित कर कुँड़ुख़ भाषा विकास को गति प्रदान किया है‚ वे सभी बधाई के पात्र हैं।   *****

![Mahidas Bhattacharya](https://www.kurukhtimes.com/wp-content/uploads/2021/09/mahidasbhattacharya.jpg)

3.  डॉ. माहिदास भट्टाचार्य‚ भाषाविद्  

प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष  

जादवपूर यूनिवर्सिटी‚ कोलकाता  

दिनांक : 15 जुलाई 2016

‘‘किसी भाषा के सम्पूर्ण विकास के लिए उसके सांस्कृतिक धरोहर को बचाकर रखना आवश्येक है। साथ ही उस भाषा का नेत्र ग्राह्य रूप यानि उस भाषा की लिपि का होना भी आवश्यकक है। वर्तमान भूमण्डलीकरण के दौर में यूनिवर्सल सिस्टम को अपनाते हुए अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाये रखने हेतु मातृभाषा की शिक्षा जरूरी है‚ किन्तु भाषा एवं लिपि के विकास के क्षेत्र में कार्य करने के लिए समाज को स्वयं आगे आना पड़ता है‚ सरकार इसमें मदद करती है। कुँड़ुख़ तोलोंग सिकि में प्रकाशित पुस्तक ‘कइलगा’‚ संस्करण – 2013 में नासिक्य स्वर सूचक एवं नासिक्य व्यंजन सूचक दोनों के लिए अलग चिन्ह नहीं है। लेखन में दोनों स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।  

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![Dilip Kr Singh](https://www.kurukhtimes.com/wp-content/uploads/2021/09/dilipkrsingh.jpg)

4.  श्री दिलीप कुमार सिंह‚ भाषाविद्  

उपप्रबंधक (राजभाषा)  

भारत कोकिंग कोल लिमिटेड‚ धनबाद  

दिनांक : 21 फरवरी 2018

भाषा और संस्कृति का आपस में गहरा संबंध है। संस्कृति को बचाने के लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपने समुदाय द्वारा संचित ज्ञान हस्तांतरित करने के लिए भाषा ही एकमात्र माध्यम है। भाषाओं का संरक्षण जैव संरक्षण जैसा ही महत्वपूर्ण है। हमारी जनजातीय भाषाएँ अनंत ज्ञान का श्रोत हैं। कई-कई हजार वर्ष पुरानी इन भाषाओं में शोध करने से बहुत सी अनसुलझी पहेलियाँ सुलझ रही हैं। इस वजह से जनजातीय भाषाएँ‚ खासतौर पर लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण की महती आवश्यजकता है। डॉ. नारायण उराँव जो पेशे से बालरोग चिकित्सक हैं‚ वे मरीजों की देखभाल और परिचर्चा जिस समर्पण भाव से करते हैं‚ उसी भाव से मातृभाषा कुँड़ुख़ की सेवा भी करते हैं। अपनी मातृभाषा को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करने की यह उनकी उत्कट अभिलाषा है‚ जिससे कुँड़ुख़ भाषा को कम्प्यूटर पर स्थान तो मिला ही‚ साथ में शिक्षा में भी उचित स्थान मिला है और इस भाषा को कई स्थानों पर पढ़ाया जाना शुरू कर दिया गया है। डॉ. उराँव का यह अतुलनीय प्रयास सभी भाषा-भाषियों को अपनी भाषा को संरक्षित करवाने और तकनीकी तथा शिक्षा एवं रोजगार की भाषा के रूप में स्थापित करवाने हेतु प्रेरित करेगा। *****

![M Rahman](https://www.kurukhtimes.com/wp-content/uploads/2021/09/drmrahman.jpg)

1-    Dr. M. Rahman   

Associate Professor (Linguistic)  

I.I.T-I.S.M. Dhanbad  

Dated : 28 February 2018

Kurukh is a North Dravidian language of the Oraon tribe of East Central India and spoken by approximately two million people. In Dravidian languages the feature of vowels nasalization is less prolific but in Indo Aryan languages like Hindi, Gujrati, Punjabi etc, the nasal vowels are found. Tamil and Kurukh as Dravidian languages have the feature of vowel nasalization. The coupling of the oral – nasal tract in the vowel utterance of the Kurukh language, adds the vowel nasalization in the language as a distinctive feature. The onset of the syllable interestingly is the stop followed by the vowel which is nasalized. The nasalized vowels in Kurukh occur in the monosyllabic or disyllabic word.  *****

![Nirmal Minj](https://www.kurukhtimes.com/wp-content/uploads/2021/09/drnirmalminj.jpg)  

6.  डॉ0 निर्मल मिंज ‘झरिया’  

संस्थापक प्राचार्य‚ गॉस्सनर कालेज‚ राँची  

लेखक‚ साहित्यकार‚ आदिवासी चिंतक एवं  

साहित्य अकादमी भाषा सम्मान 2016 से सम्मानित।  

दिनांक : 15 नवम्बदर 2019

कुंड़ुख़ कत्था गही ख़ीःरी गा दिघम रअ़ई। बरा नाम गुनईन ननोत। कत्था कछनखरना अरा अदिन एःरा गे सीःबा ख़ाःरना गही कत्था गा ननना मनो। इय्या कुँड़ुख़ कत्था अरा लिपि पइत्त नु अख़ना गही बखनी नंज्ज एःरोत। कछनखरना अरा ख़ेबदा ती मेनना मुनता ख़ीःरी तली‚ मुन्दा कत्थन मेनर की अदिन ख़न्न ती एःरना बेसे चिन्हाँ चिअ़ना एँड़ता चम्मबी तली। अदा – आद अंगरेजी‚ अदा – आद हिन्दी ! अन्नेम एःरर किम तेंग्गोर चिओर का इःद का आद‚ एन्नेद का अन्नेद बओर। अवंगेम कुँड़ुख़ लिपि गही ख़ीःरी तेंग्गना अरा अदिन टूड़ना-बचना ही चाँड़ मनो। 

एकअम लिपि नु तोःड़ उरमिन ती सन्नी दरा ओःरे चटख़ना तली। कुँड़ुख़ नु सरह तोःड़ 6 गोटंग i e u o a A / इ ए उ ओ अ आ मनी अरा हरह तोःड़ गा 35 गोटंग मनी‚ अदिन इसन तेंग्गना चाँड़ मल्ला। पहें हरह तोःड़  प  ती ओःरे मनी। आद एन्ने  p P b B m  बेसे इथिर’ई अरा इबड़द प् फ् ब् भ् म्  बअर फुरूचतार’ई। इदिन गा कुँड़ुख़र अरा आदिवासी लूरगरियर घोःड़चर दरा एःदर चिच्चर का कुँड़ुख़ हहस तोःड़ इवन्दम मनो। अबड़न जोड़-नाड़ ननर किम सिखिरना मनो। फिन दिगहा‚ सन्नी फरक-फरक ननअम मनी। अदिन तेंग्गा गे चिनहाँ मनी। तोलोंग सिकि ही प अरा हिन्दी गही  i  हहसन दिगहा कमआ गे हिन्दी नु ी  टूड़ना मनी‚ मुन्दा कुँड़ुख़ नु  ः  चिआ ख़ने आद दिगहा मनी काःली। अन्नेम कुँड़ुख़ नु  ‘स’ ओण्टे एका मनी। ष अरा श मल मनी। हिन्दी ही क्ष‚ त्र‚ ज्ञ‚ श्र हुँ मल मनी। ख़  ञ़ अरा अ़ तोड़ हिन्दी ती बिलग बि’ई।

इदा ! एरा तो एःन गा तोलोङ सिकि नुम नमुद चिआ-चिआ तेंग्गा बेद्दा लगदन। अक्कु एःन‚ तोलोङ सिकि एका से कुँड़ुख़ कत्था ही बखड़े नु बरचा दरा कोरचा अदिन अक्कु तेंग्गोन-मेन्तओन। एःन गा जोंख़ परिया तिम कुँड़ुख़ लिपि पइत्त नु बेद्दा गे ओःरे नंज्जकन। ओःरे नु ओन्टा सामुएल रंका नाःमे ही मास्टरस सन्त पॉल लूरकुड़िया नु बचतआ लगियस। आ रंका मास्टरस कुँड़ुख़ लिपि ओत्थरस। आस – ‘न’ गे नेर्र बेसे चिनहाँ कमनुम केरस। मुन्दा टूड़ा गे उजगोम पोल्ला काःला। जोक्क गेच्छा काःलर आद मुंज्जरा केरा। इदि ख़ोःखा ओरोत डॉ. अनन्ती जेबा सिंह नाःमे ही तमिल मुक्का ‘ब्राहमी लिपि’ ती ‘बराती लिपि’ ओत्थरा। अदिन जोक्क कुँड़ुख़र इंजिरअर ‘‘बाईबलन’’ कुँड़ुख़ नु तरजुमा ननर आ ब्राहमी लिपि ती चिपताःचर। आद हिन्दी ती नन्ना मल एत्थरा। ई ब्राहमी लिपि हूं बग्गे उल्ला ठठआ पोल्ला। मुन्ध नु फर्दिनेन्द हॉनस गने मिसनरी सहेबर रोमन लिपि ती ढेर बग्गे पुथि टूड़यर। नाम हुँ अदिन इंजिरअर टूड़ा-बचआ ओःरे नंज्जकत‚ मुन्दा आद हुँ बग्गे उल्ला संग्गे चिआ पोल्ला। रोमन लिपि ख़ोःख़ा कुँड़ुख़र देवनागरी लिपिन इंजिरअर दरा टूड़ा-बचआ ओरे नंज्जर अरा अक्कुन गूटी मोघोरका रअ़नर। मुन्दा इत्ती एन्देर मलदव मना लगी अदिन गा आर मलम घोखआ लगनर। कुँड़ुख़ कत्था हिन्दी गही पतड़ा‚ टोड़ंग‚ परता नु एबेसेरआ काःला लगी। इत्ती कुँड़ुख़ कत्था नूख़ूरआ-नूख़ूरआ उज्जा लगी। दहदर कुँड़ुख़ मलम एथेरआ लगी। इदिन जोक्क कुँड़ुख़र ईःरयर‚ बुज्झरर‚ घोखचर। ई मजही नुम धरमे सवंग डॉ. नारायण उराँव ‘सैन्दा’ सिन चाःजर मुन्दहाःरे ओन्दरा। आस कुँड़ुख़ नेग चाःलो ही मूःलीन धरअर की डण्डा कट्टना (भेलवाफड़ी) नेगचार ती गुनआ ओःरे नंज्जस। दरभंगा मेडिकल कॉलेज‚ लहेरियासराय (बिहार) नु डॉक्टरी ही पढ़ाई ननु सिन धरमे‚ आस गही मेद्दोन तिखड़ाःचा दरा तोलोङ सिकि ही छपन‚ कुँड़ुख़ लिपि रूःपे नु दहदर ननताःचा। आस गने जोक्क कुँड़ुख़र संग्गे चिअर नलख नना हेल्लरर। डॉ0 फ्रांसिस एक्का‚ डॉ0 रामदयाल मुण्डा‚ इरबारिम भखा विज्ञान गही पंडितर सन्नी कमिटि गने होटल महाराजा‚ कचहरी चौक‚ राँची नु ओक्कर तोलोङ सिकिन फँड़ियाःचर दरा ओरमर छमहें एःदर चिच्चर का तोलोङ सिकि दिम कुँड़ुख़ कत्था अरा उरमी आदिवासी भखा गे दःव मनो। कुँड़ुख़ गे गा तोलोङ सिकि अक्कु नमजद्दी मंज्जा केरा। झारखण्ड अरा पश्चिम बंगाल सरकार इदिन इंज्जरा दरा असम‚ छतीसगढ़‚ ओड़िसा‚ नेपाल‚ भूटान तरा हुँ ईद परदा लगी अरा असन टूड़ा-बचआ लगनर।

डॉ0 नारायण उराँव ‘सैन्दस‚ गने जोक्क कुँड़ख़र संग्गे मनर ‘‘बक्कहुही’’ नाःमे ही ओण्टा मून्दचन्दोख़ (त्रैमासिक) कुँड़ुख़ पतख़ा (पत्रिका) ओथोरआ लगनर। आद झारखण्ड’ प. बंगाल‚ असम‚ ओड़िसा‚ छतीसगढ़‚ यू.पी. अरा नन्ना राःजी तरा बींड़िरआ लगी। कुँड़ुख़ लिटरेरी सोसायटी‚ दिल्ली हुँ अक्कु इंज्जरा‚ पहें तोलोङ सिकि ती बग्गे नलख अरगी मना। अक्कु गा बअना मनो का तोलोङ सिकि दिम कुँड़ुख़ कत्था गही सिकि तली।  *****

आलेख एवं सकलन –  

डॉ. नारायण उराँव ‘सैन्दा’  

शोध एवं अनुसंधान  

(तोलोंङ सिकि‚ लिपि)    

