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title: कुड़ुख़ भाषा आंदोलन के अग्रदूत व लापुंग के समाजसेवी एवं सरन उरांव को अंतिम विदाई
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  name: admin
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date: '2026-06-16T14:49:16+00:00'
modified: '2026-06-16T14:58:33+00:00'
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categories:
  - Current Affairs
  - Personalities
tags:
  - Lapung Village
  - Saran Oraon No More
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# कुड़ुख़ भाषा आंदोलन के अग्रदूत व लापुंग के समाजसेवी एवं सरन उरांव को अंतिम विदाई

**रांची/लापुंग, 16 जून 2026।** लापुंग थाना क्षेत्र के माड़ी दरमी टोली निवासी एवं कुड़ुख़ भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित वरिष्ठ समाजसेवी श्री सरन उरांव का 77 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे श्री उरांव ने 14 जून 2026 की सुबह 7 बजे अंतिम सांस ली। उन्हें 15 जून को उनके पैतृक गांव दरमी टोली में पूरे सम्मान के साथ अंतिम श्रद्धांजलि दी गई।

श्री सरन उरांव का जन्म लापुंग प्रखंड के दरमी टोली गांव में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव के विद्यालय से प्राप्त करने के बाद उन्होंने रांची में उच्च शिक्षा हासिल की। उन्होंने एम.ए. तथा एल.एल.बी. की पढ़ाई की और बाद में तत्कालीन ए.जी. बिहार के लेखा विभाग में सरकारी सेवा में योगदान दिया। लंबे समय तक ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ कार्य करते हुए वे वरिष्ठ लेखाकार (सीनियर अकाउंटेंट) के पद से सेवानिवृत्त हुए।

साधारण किसान परिवार से आने वाले श्री उरांव ने जीवन में अनेक चुनौतियों का सामना किया। बचपन से ही दोनों पैरों में कमजोरी होने के बावजूद उन्होंने कभी इसे अपनी प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया। अपनी प्रतिभा, दृढ़ इच्छाशक्ति और बौद्धिक क्षमता के बल पर उन्होंने समाज में एक विशिष्ट पहचान बनाई।

सरन उरांव आदिवासी समाज, विशेषकर उरांव समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के लिए सक्रिय रहे। वे लोकगीत, वादन और पारंपरिक नृत्य कला के कुशल प्रशिक्षक थे। विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी रहती थी और उन्होंने अनेक लोगों को पारंपरिक कला एवं संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया।

उन्होंने कई पुस्तकों के प्रकाशन और शोध कार्यों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुड़ुख़ भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए वे निरंतर प्रयासरत रहे।

श्री उरांव ‘अद्दी कुड़ुख़ चाला धुमकुड़िया पाडहा अखड़ा’ संस्था के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2025-26 तक उन्होंने संस्था के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनके नेतृत्व में संस्था ने कुड़ुख़ भाषा और तोलोंग सिकि लिपि के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं।

टाटा स्टील फाउंडेशन के सहयोग से संस्था द्वारा झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में 54 कुड़ुख़ भाषा एवं तोलोंग सिकि लिपि शिक्षण केंद्रों का सफल संचालन किया जा रहा है। इस पहल को आदिवासी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

अद्दी कुड़ुख़ चाला धुमकुड़िया पाडहा अखड़ा, झारखंड ने श्री सरन उरांव के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि कुड़ुख़ भाषा, संस्कृति और समाज के लिए उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा।

समाज के विभिन्न वर्गों ने भी उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की है।

